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जाने कैसी होगी जन्नत

ना जाने कहाँ होगी

शायद यहीं कहीं पर हो

या महज़ कल्पना होगी


अधूरी किसी रचना जैसी

जहां से बेहतर क्या होगी

ना जाने किसका फितूर था

जाने किसने गढ़ी होगी ।


मं शर्मा (रज़ा)

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