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अब जो थामा है

हाथ छूटने न देना

मन में जागा है

विश्वास टूटने न देना


अब न जाऊँ मैं कहीं

छोड़कर ये दर तेरा

अपनी नज़रों से

मुझे दूर होने न देना।


मं शर्मा (रज़ा)

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