दस्तूर's image
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शाख से टूटते ही

पत्ते की साख नहीं

नज़र से गिरे हुए की

कोई औकात नहीं।


चढ़ते सूरज को

पूजता है हर कोई

डूबते को थामने का

कोई दस्तूर नहीं।


मं शर्मा (रज़ा)

#स्वरचित

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