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ब्रज रज में बसे हुए हैं

कान्हा के अनन्य रूप

कण कण में महक रहे हैं

अबीर गुलाल के फूल


हवाओं में गूँज उठती है

आज भी बंसी की तानें

ब्रज रज न लगी जिस तन

वो अभागा क्या जाने ।



मं शर्मा (रज़ा)



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