बरसात's image
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इन लहरों के उद्वेलन को

साँसों की इस धड़कन को

माना नहीं सुन सके हो तुम

अहसासों की सरगम को


जेठ बैसाख बहुत झुलसे हैं

बूँद बूँद को कितना तरसे हैं

बौछारों से महरूम न होना

अबकी बरस बरसात में तुम।


मं शर्मा (रज़ा)


#स्वरचित

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