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तपते सूरज से

अग्नि बरसे

प्यासी धरती

पानी को तरसे


कौन मिटाए

इनकी अगन

जाने कब

बरसेंगे घन


बदरा भूल गए

क्यों रास्ता

अब के बरस

क्यों रूठा सावन।


मं शर्मा (रज़ा)

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