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अनुबंध नहीं संबंध थे

इस जीवन का आनंद थे

विश्वास की डोर से बंधे

पर स्वतः पूर्ण स्वच्छंद थे


दोस्त दगा कर गया कोई

अपना ही छल गया कोई

संबंधों की ऐसे तिरकी डोर

चल पड़े जाने किस ओर।


मं शर्मा (रज़ा)

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