अमर प्रेम's image
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निश्छल प्रेम की

निर्झर धारा में

मन का हंस

कलोल करे


अमर प्रेम का

मधुर संगीत

तन मन को

आनंदित करे


कोई चाह नहीं

कोई डाह नहीं

मन मीरा होकर

तुझमें मगन रहे।


मं शर्मा (रज़ा)


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