अक्स's image
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ज़रा सी चोट से चटक जाता

टूट कर बिखर जाता

पत्थर की जरूरत क्या थी

शर्म से ही तिरक जाता


टुकड़े कितने भी हो जाते

सूरत अपनी भी भूल जाता

मगर हर एक टुकड़े में

तेरा ही अक्स दिखलाता।

  मं शर्मा (रज़ा)

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