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Romantic PoetryPoetry1 min read

ख़्वाब बिखरते रहे…

Manish HManish H February 18, 2022
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बेवजह की दुनियादारी मे हम यूँ ही उलझते रहे

वक़्त गुज़रता गया, और ख़्वाब बिखरते रहे|


दिल की ही कहेंगे, दिल की ही सुनेंगे,

अपनी राह खुद चुनेंगे, बस कहते रहे|


ख़्वाहिशें अधूरी रही, जो सोचा वो न कर पाये

आँख भर आयी मगर, मुस्कुराकर सहते रहे|


किसी की किताब छपी, किसी ने ख़्वाबों की तामीर की

ठंडी आहें भरकर हम, हसरतों से उन्हे तकते रहे|


ये मजबूरियाँ अपनी है, वो ख़्वाब भी अपने थे

हकीकत जो न बन पाये, उनके लिये तरसते रहे|


न बात निकली, न ज़िक्र हुआ, दास्ताँ अपनी किससे कहे

हसती-खिलती महफ़िल मे, हम भी फिर हसते रहे|


जिंदगी कुछ यूँ गुजरी, यारी, रिश्ते, फर्ज़ निभाते रहे

‘मनिष’ तो ख़ाक हो गया, अरमाँ मगर सुलगते रहे|

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