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ताले और चाबियां

Mamta PanditMamta Pandit January 7, 2022
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ताले और चाबियां


चाबियां थमा ,

बना दिया गया मुझे मालकिन,

और मैं इस भुलावे में आ

तालों में उलझती रही, दिन-ब-दिन ।


रसोई से शयनकक्ष तक,

घुमाती रही

कर्तव्यों की चाबियां ।

लगाती रही ताले

अपने आदतों, अरमानों पर,

प्रगति के पायदानों पर,

कभी आंसू , 

और कभी मुस्कानों पर ।


धीरे धीरे यूं ही ,

घुटन बड़ती रही ।समझने लगी,

की इन चाबियों से

कैद करती जा रही हूँ

खुद को कहीं ।


अचानक एक दिन 

जब छटपटाती हूँ ।

अपने लगाए इन बंधनो को

तोड़ने की हिम्मत जुटाती हूँ।वही चाबियां बार बार घुमाती हूँ।


हताश निराश हो ,

आखिर हार जाती हूँ ।

जब होश में आती हूँ 

यही सवाल दोहराती हूँ

कर्तव्यों की चाबीयों से 

अधिकारों के ताले

क्यों नहीं खोल पाती हूँ।

क्यों नहीं खोल पाती हूँ। 


-ममता पंडित 



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