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फिर यहीं...


समय के गिद्ध से छुपकर

सूरज की तरह डूब जाना चाहती हूँ...

किसी एक शाम...

और उग आऊंगी, फिर यहीं। 


क्षितिज की सीमाएं नापते हुए 

थक चुकी हूँ 

ठहर जाना चाहती हूँ

किसी बदल पर..

और बरस जाऊंगी , फिर यहीं...।


अंधेरे को ओढ़ते हुए

धीरे धीरे चांद की तरह..

अमावस बन जाना चाहती हूँ .. 

किसी एक रात को..

और तारों सी जगमगाऊंगी, फिर यहीं । 


यूं किसी बहाने से...

रूठ जाना चाहती हूँ

कुछ दिनों के लिये.. 

मांन जाऊंगी खुद ही एक दिन

और इन आँखों में मुस्कुराउंगी , फिर यहीं ।



-ममता पंडित

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