गंगा - ब्रह्मपुत्र's image
Poetry2 min read

गंगा - ब्रह्मपुत्र

Mahima ThakurMahima Thakur April 23, 2022
Share0 Bookmarks 142 Reads0 Likes
परस्पर उत्पत्ति का स्त्रोत हिमालय 
गंगा - ब्रह्मपुत्र का आरंभ शिवालय!

वे सर्वदा संग - संग नहीं बहते
बेफिक्र, संतोषमय,
अपनी प्रत्येक धारा में प्रसन्नचित,
एकाकी बहते हैं...
और बनाते हैं हरित आवरण,
चलते जाते हैं,अपने -अपने रास्ते
परंतु उनकी उत्पत्ति का स्त्रोत 
एक ही है ...हिमालय!
और मिलन का परिणाम भी एक... मेघना!

उनका मिलना मानो 
प्रसिद्ध भौगोलिक रचना!
जैसे गंगा, छुपा लेती है ब्रह्मपुत्र को 
पुत्र सा प्रेम देते हुए
अपने वात्सल्यपूर्ण आंचल में,
ठीक उसी तरह गंगा को प्राप्त होता है पावन प्रेम,
जो ब्रह्मपुत्र ने उसे अर्पित किया है!
मेघना में समाहित होना उनका अंत नहीं है
दोनों का प्रारब्ध है, एक महान आरंभ है!

उनका मिलना ही स्वतंत्रता का प्रतीक है और
सागर का विशाल हृदय है शांतिधाम,
जहां सब कुछ स्वीकार है
सुख -दुख, प्रश्न -हल, पवित्रता -अपवित्रता..
और त्रुटियां भी..
सागर महान है, हो भी अगर तो
कष्ट निवारण कर उनको शांत करता है!
और सागर बन जाता है हिंद महासागर!

_महिमा ठाकुर

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts