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अस्तित्वहीन

Mahima ThakurMahima Thakur April 9, 2022
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मैं चले जाना चाहती हूं

उस अस्तित्वहीन दुनिया में,

जिसका कोई वजूद कभी था ही नहीं

और मेरे पहुंचने के बाद भी होगा नहीं

उसका अस्तित्व तो इसी क्षण में है

जब मैं वहां जाने की ईच्छा रखती हूं।


मैं त्याग देना चाहती हूं

इस बीहड़मयी जीवन को।

अस्तित्व से परे उस सुकून से मिलना है

जो कभी था ही नहीं,

काल्पनिक सुकून कभी होगा ही नहीं

वो तो अभी है, इसी पल में

जब मैं अस्तित्वहीन को देख पाने का

साहस जुटा पाती हूं,

मैं साहस में उसको पा लेती हूं।


क्षण भर में दुनिया छोड़ देती हूं मैं...

अगला क्षण इसी लोक में

अठखेलियां करता है।

हर परिवर्तनशील पल

संदेश देता है...

अस्तित्वहीन सुकून,

नजरिया व्यक्त करता है..

परलोक को झुठलाता,

इहलोक सत्यापित करता है।


_महिमा ठाकुर

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