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भीड़ है हर तरफ 

चौरासी घाट 

अनंत आस्थाएं 

जलती चिताएं 

चलते- फिरते शव 

गंगा पार जाना है आज 


सभ्यता शुरू हुई थी 

नदी किनारे 

अंत भी वही है 

जीवन सारांश 

हारे हुए विजेता 


भोर की सर्द हवाएं 

रूह छू लेंगी जैसे 

मन भारी है 

आस्था का खो जाना 

अपने को खोने जैसा है 

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