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एक बार "मैं" फिर से "मैं" होना चाहती

हूं।

न किसी की अपनी न पराई होना चाहती

हूं।

इन अनजानी राहों में खुद का वजूद ढूंढना चाहती हूं।

ना किसी रिश्ते, रिवाजों का कोई बंधन चाहती

हूं।

हर बंधनों से दूर कहीं खुद का एक सपना होना चाहती हूं।

हर सवालों का अब "मैं"खुद में ही जवाब होना चाहती हूं।

हां.. एक बार मैं" फिर मैं" होना चाहती

हूं।।


।।लक्ष्मी दूबे।।

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