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“ठहरा हूँ …”

Lalit SarswatLalit Sarswat November 17, 2022
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ठहरा हूँ …”


ठहरा हुआ हूँ कब से,

बस इसी इंतेज़ार में,

के कब तुम मेरा हाथ थामे,

मुझे जन्नत ले चलो,

और मैं तुम्हें चाँद की

सैर कराऊँअपनी पीठ पर,

ताक़ि तेरे क़दम ना थके,

और बस देखता रहूँ

तेरी निगाहों में,

तलाश करूँ अक़्स मेरा.

की कहीं निकल तो नहीं गया,

तेरे अश्क़ के संग बहता हुआ।

ठहरा हूँ…!


ठहरा हुआ हूँ कब से,

बस इसी इंतेज़ार में,

के कब तुम समा जाओ,

मेरी मुरझाई आग़ोश में,

और खिला दो बगिया प्रेम की,

जो मुरझा गई थी,

तेरी मोहब्बत की बारिश के लिए,

बस बचे थे काँटे जिसमें,

आज कलियाँ खिल रही हैं,

फ़ुल महताब का,

देखोकैसे महक रहा है,

तेरी साँसों की ख़ुशबू लिए। 

ठहरा हूँ…!


ठहरा हुआ हूँ कब से,

बस इसी इंतेज़ार में,

के आँगन में तेरी पायल की

खनक एक बार फिर गूंजे,

तेरी हँसी-ठीठोली से,

मेरा घर चमके,

बस इसी ख़्वाब में,

दिल के अरमां सजाए,

दरवाज़े कब से खोल बैठा हूँ,

टकटकी लगाए राह पर,

जो आती दिखाई दे रही मेरी तरफ़,

और निकल जाती हैं ना जाने कहाँ। 

ठहरा हूँ…!


ठहरा हुआ हूँ कब से,

बस इसी इंतेज़ार में,

के मेरे हरफ़ बने तेरी सदाओं से

जिनसे स्याह करता पन्ने

ज़िंदगी के हज़ारकिताबों में

ना जाने कौन से एहसास 

दर्ज कर रहा इस लिहाफ़ में

क़लम अब थकती नहीं मेरी

तेरी अदाएगी में

नज़राना क्या लिख रहा

पढ़ोसमझो दिल का हाल मेरा

मुझे भी समझा देना एक और बार। 

ठहरा हूँ…!



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