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“क़दम ठहर गए”

Lalit SarswatLalit Sarswat October 30, 2022
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क़दम ठहर गए


उम्र के ऐसे पायदान पर अब  पहुँचे हैं

ख़्वाहिशों को तकिए के नीचे दबा बैठें हैं

कहीं बिस्तर पर सिलवटें ना पड़ जाए 

इस तरह समेटे ख़ुद को पत्थर बना बैठें हैं।


आशियाना बनाया था बड़ी शिद्दत से 

आज दीवारें उसकी बेआबरू हो रही हैं

नींव जो रखी थी ईमान और मेहनत से

आज नई पीढ़ी उन्हें खोखला कर रहीं हैं।


एक वो ज़माना जी लिया हमनें भी सुनो

शर्म आँखों का काज़ल हुआ करती थी

अब बेपरदा घर की इज़्ज़त हो रही देखो

जो पहचान घराने की हुआ करती थी।


जो होते थे ज़िंदगी के दारोमदार कभी

आज रिश्ते वो बाज़ारू हो चुके हैं

गुल्लकों में जमा होती थी जो बातें कभी

आज मोहल्लों में नीलाम हो रहीं हैं। 


पौ फुटते जो हाथ कभी पैरों को छूते थे

आज गिरेबान पर डेरा डाल रहें हैं

बस एक डाँट से जो डर ज़ाया करते थे 

आज वो अपनी आँखें दिखा रहें हैं।


विरासत में मिलती थी तालीम जीने की

आज नशे के कश में उन्हें उड़ा रहें हैं

चुल्लू भर पानी था काफ़ी शर्मिंदगी के लिए

आज ज़ामों के प्याले पिए जा रहें हैं।


दौलत का कभी ज़िक्र नहीं होता था 

आज तराज़ू में औक़ात तोल रहें हैं

मुफ़लिसी भी थी एक मुस्कुराहट लिए

आज उजालों को अंधेरे से जला रहें हैं।


यह तब्दीली कब और कैसे हिस्सा बनी

ना जाने ज़िंदगी भी क्यूँ कैसे बेरंग बनी

नए दौर के इस बदलते मिज़ाज को देख

क्यूँ आँखें नम और मेरी रूह बिख़र गई

समटेने को कोशिश आज भी कर रहा हूँ

जो छूट गए उन्हें बुलाने की वज़ह ढूँढ रहा हूँ

पुकार मेरी ना जाने कहाँ गुम हो गई है

एक एक कर मेरे अपनों से रूठ रही है

मुझे कहाँ मालूम था की दुनिया बदल गई

रिश्ते-नाते और मकां को सुना कर गई

बदलते वक़्त की सुइयों पर क़दम ठहर गए

हम जैसे थे पहले आज भी वैसे रह गए।

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