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“मेरी पहचान”

Lalit SarswatLalit Sarswat December 22, 2022
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मेरी पहचान


तुने क्या समझा थाक्यूँ ग़ैरत मेरी जानी नहीं,

मुसलसल ज़िंदगी मेरीहाथ मेरा थामा नहीं,

फ़िक्र तो रात को भी चाँद की हो ही जाती है,

सुरज की आस मेंदिए की क़द्र पहचानी नहीं।


हरफ़ हज़ार लिखेएहसास कभी लिखे नहीं,

मेरी तमन्नाओं का दामन तूने कभी पकड़ा नहीं,

चंद अल्फ़ाज़ होते काफ़ी है एक दुआ के लिए,

क्या नसीब में मेरेएक अदद वो दुआ भी नहीं।


चलो अब अपनी असली पहचान तुम्हें बताता हूँ,

अपना असली अक़्स तुम्हें आइने में दिखाता हूँ,

मेरी बातों को कोई भुलावा ना समझ लेना तुम,

आज तुम्हें मेरे कुछ एक जलवों से मिलवाता हूँ।


छोड़ ख़ुदा कोएहसान इंसान का लिया नहीं,

फ़क्र रखा हैंनज़रें झुका कर कभी जिया नहीं,

जीत ज़रूरी है ज़िंदगी की मंज़िलों पर  दोस्त,

पाने मुक़द्दर कोहम मौक़ापरस्त कभी हुए नहीं।


तूफ़ानों से खेले हैंहम लहरों से कभी डरे नहीं,

चट्टानों से मिज़ाज हैकच्ची मिट्टी के घड़े नहीं,

कब तक समंदर की गहराइयों का वास्ता दोगे,

चलो मान लिया किश्ती टूटी हैडूबी तो नहीं।


महफ़िलें हमसे हैंहम वो ग़मगिन शाम तो नहीं,

शराबों और शबाब का दौर हैहम अनजान नहीं,

ज़हर के प्याले पिये अक्सर कई ज़िंदगी के हमनें,

ज़ख़्म ही तो हैक़यामत की स्याह रात तो नहीं।


सफ़र का अभी आगाज़ हैकोई अंजाम नहीं,

परिंदा आज़ाद आसमां काकोई ग़ुलाम नहीं,

फ़लक तक अब जहां अपना हैयह जान लो,

अब मंज़िल से पहले रुकने की गुंजाइश नहीं।


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