“मनु”'s image
Share0 Bookmarks 8 Reads0 Likes

मनु


स्वार्थ सिद्ध में सिद्धांत भुलाहै भुला सब संस्कार,

दो टके में आत्मा बेचीदेखो मनु बन रहा भगवान।

भक्ति भाव से वंचितदेखो है भूल रहा परोपकार,

माया मोह से बंधा मनसंसार त्याग रहा सुविचार।


राग-द्वेषलिप्सा युक्तक्यूँ कर रहा वरण पापाचार,

मनु कहाँ फँसा ब्रह्मजाल मेंक्यूँ सहे यह अत्याचार।

अंधकार से रज रहाकलुषित करते तुम्हें व्याभिचार,

सिद्धपुरुष अब कहां मिलेचहुं और मचा हाहाकार।


ओज-तेज सब धूमिल हो रहेप्राण तज रहे निरंकार,

तपस्यासमाधि सब छूटे पिछेबचा बस अहंकार। 

ग्लानि भावना नहीं बचीक्यूँ पनप रहे मनु कुविचार,

अंत से क्यूँ अब डर नहींअमरता का ना रहा संचार।


कुंठित मन सेप्रेम निस्तारितक्यूँ भूले मनु सदाचार,

अर्थ सिंचन में व्यस्त रहेक्यूँ बंधे निज के कारागार।

मित्रतारिश्तों की मर्यादा भूलचुप क्यूँ यह संसार,

विघटन में विश्वास करमनु क्यूँ दुहाई देता निराधार।


सोमरस का आलिंगनधुआँ उड़ाताखोया सुशासन,

चीर हरण निस दिन हो रहाआत्मा को क्यूँ कोस रहा।

व्यर्थ के चिंतन में मनुदेखो कैसे अस्तित्व खोज रहा,

एक कोने में रखी मनुस्मृति कोक्यूँ फिर से खोल रहा। 

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts