“हाल-ऐ-ज़िंदगी”'s image
Poetry2 min read

“हाल-ऐ-ज़िंदगी”

Lalit SarswatLalit Sarswat December 16, 2022
Share0 Bookmarks 15 Reads1 Likes

हाल--ज़िंदगी


थे कभी ज़िंदा दिल हम भी  मेरे दोस्त,

अब ज़िंदा रहने का बहाना ढूँढने में लगे हैं।


एक ज़माना थाजी लिए जी भर कर,

अब वक़्त भी उधार लिए जी रहे हैं,

थी कोशिशें लाख़ कशिश को पाने की,

अब साँसें भी गिन गिन कर जी रहे हैं।


तमन्ना-चाहत थीकुछ कर गुज़रने की,

अब कुछ हौंसला बटोरनें में लगे हैं,

ज़ुनूने-इंक़लाब था हर सोच में एक वक़्त,

अब रहम की गुंजाइशों में लगे हैं।


रंजिशें थीमोहब्बत थीदिल जिंदा था,

अब एक रूह की तलाश में लगे हैं,

अश्क़ थेगीले शिकवे भी थे किसी से,

अब प्यासेदरिया की तलाश में लगे हैं। 


मुक़द्दर से कभी हारे नहीं थेज़ुर्रत थी,

अब तक़दीर की आस में जगे हैं,

क़ायनात को भी कभी पैरों में रखते थे,

अब क़यामत से तौबा करने में लगे हैं।


थी ख़ुमारी कभी खूँ में दौड़ती गर्मी की,

अब ग़र्म आग़ोश की दुआ में लगे हैं,

जो थे उन गुज़री राहों के शहंशाह हम,

अब एक कारवां की चाह में लगे हैं।


नाप तोल कभी किया नहीं ज़िंदगी का,

अब हर आँसू-हंसी तोलने में लगे हैं,

यक़ीन था सूनी होगी नहीं महफ़िल कभी,

अब एक-एक ख़ुशी बटोरने में लगे हैं।


थे कभी ज़िंदा दिल हम भी  मेरे दोस्त,

अब ज़िंदा रहने का बहाना ढूँढने में लगे हैं।


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts