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“ऐ ज़िंदगी! तुझे क्या नाम दूँ?”

Lalit SarswatLalit Sarswat November 10, 2022
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 ज़िंदगीतुझे क्या नाम दूँ?”


 ज़िंदगीतुझे क्या नाम दूँ?

सुकून कहूँ या फिर दर्द कहूँ

या कहूँ तुझे तक़दीर मेरी

जिसे मैंने कभी चाहा ही ना था। 

मिली भी हो तो रेत की तरह

ठहरती ही नहीं मेरी मुट्ठी में

और में प्यासा एक साहिर तेरा

प्यास बुझती नहीं तेरी गहराई से।

बस एक एहसान तुझसे चाह रहा

कभी आज़ाद मुझे तू करदे

उड़ सकूँ मैं भी परिंदे की तरह

बस इतना सा एहतराम करदे।


 ज़िंदगीतुझे क्या नाम दूँ?

गुलिस्ताँ कहूँ या बियावान कोई

फूलों के बदले जहां काँटे ही मिले

जहां ख्वाहिशें पूरी कभी होती नहीं।

एक टक देख रहा वो तपता आस्मां

धूप ही मिली कभी बारिश ना मिली

और धुएँ से ढकी रात की चाँदनी

सुनी पड़ी आँखों में जलन दे रही।

ज़िंदगी सुनो अब तुमसे क्या कहूँ

सुने मकां की दास्तां कैसे बयां करूँ

दीवारें ढह रही अब कुछ बचा नहीं

ज़िंदगी अब मुझे भी ज़मींदोज़ करदे

बस इतना सा एहतराम करदे।


 ज़िंदगीतुझे क्या नाम दूँ?

अश्क़ कहूँ या फिर रश्क़ कहूँ

हिस्सा दोनो ही मेरे इश्क़ का

जो कभी पूरा हुआ ही नहीं।

रंजो दिल की तमन्ना यही अब

ना रहे दिल में कोई जद्दोजहद

ग़र मिले मुझे या ना मिले तू

मेरी आशिक़ी तुझसे ना हो कम।

एक दुआ यही ख़ुदा से कर रहा

हर साँस मैं तेरे नाम की जी रहा

ना दिखे तेरी डोली सजते मुझे

जनाज़ा उठे मेरा तेरी रुख़सत से पहले

बस इतना सा एहतराम करदे।



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