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“अब और क्या लिखूँ?”

Lalit SarswatLalit Sarswat November 14, 2022
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अब और क्या लिखूँ?”


आज शाम को बैठा

किसी सोच में तनहा-अकेला,

तभी एक आवाज़ निकली,

कहीं दिल के कोने से,

आवाज़ दे बुला रही मुझे,

वही सोच जो मचल रही थी,

उकेर जाने को काग़ज़ पर,

उसी स्याही से,

जिसे बरसों से बिख़ेर रहा था,

उन्हें आकार दे,

साकार कर रहा था,

अपनी दिल की बातों को,

पन्नों पर लिख रहा था। 


पन्ने जो अब पुराने हो गए,

युहीं बंद रहते हुए,

कुछ बदरंग हो गए थे,

कुछ थे चिपके एक दुजे से,

जैसे बरसों पुराने,

बिछड़े आशिक़ हो गए थे।

उन्ही कुछ पन्नों के बीच,

था छिपा किसी ज़माने का,

लाल सुर्ख़ एक प्रेम संगीत,

जो याद दिला रहा था,

मेरा गुज़रा वक़्त,

जो कभी किसी और का,

वक़्त हुआ करता था।

अब भी कुछ ख़ाली से थे,

पन्ने इंतेज़ार में,

कि कभी तो उन पर कुछ लिखूँगा,

अल्फ़ाज़ कुछ उनमें,

शामिल करूँगा,

और उनकी सादी ज़िंदगी पर,

स्याही से एहसास कुछ भरूँगा।


कलमहाँ एक कलम ही तो है,

जिसने कभी साथ मेरा छोड़ा नहीं,

ख़ुशी हो या ग़म ज़िंदगी के,

अल्फ़ाज़ बयां करना छोड़ा नहीं,

मेरी रूह को ज़िंदा रखती,

मेरे धुंधले से उस अक़्स को,

काग़ज़ पर पूरा वो करती,

और दिखा जाती दुनिया को,

बड़ी साफ़गोई से,

वही चेहरा मेरे एहसासों का,

जिन्हें रखा था छिपा सबसे,

एक बड़े ज़माने से,

जिन्हें बांध रखा था ज़ंजीरों से,

अंधेरी एक काल कोठरी में,

जिसकी चाभी को रखता था,

सम्भाले गहरे समंदर में,

ताकि कोई झांक ना ले,

मेरे सिसकते उन ख़्यालों में,

जो थे किसी ख़ास की अमानत,

जो दे गया था ज़ख़्म ज़िंदगी में,

जिनसे रिसता था लहूँ मेरा,

मेरी उन ख़ाली सुनी आँखों से।


डर रखता है अब निगहबां मुझे,

दर्द रखता है मुझे अपने तले,

और कहता हर वक़्त यही,

मेरी हर साँस और हर नींद में,

कि कहीं मैं उसे याद ना कर लूँ,

ग़लती से भी उसका,

उन ख़ाली पड़े पन्नों पर,

स्याही से ज़िक्र ना कर दूँ,

और ना निकाल लूँ वो चीख़,

जिसे एक बोझ ने दबा रखा है,

वही पत्थर दिल सनम ने,

जिसने रूह को मेरी जला रखा है,

और ख़ाक करती अब यादें उसकी,

ज़िंदगी को धुआँ कर रही,

और ज़िंदगी की हर साँस मेरी,

मुझसे अब यह कह रही,

कि अब बचा ही क्या तेरे पास,

जिसे तू ज़माने को दिखाए,

जिसका ज़िक्र कभी,

किसी कविता में कर जाए,

छोड़ अब उन पुरानी यादों को,

और अपनी ज़िंदगी तू जी,

वर्ना होगा ख़ाक मिट्टी में युहिं,

अगर उसकी और तम्मना की। 


अब हो गया फ़साना ख़त्म मेरा,

अब अल्फ़ाज़ों ने भी,

अलविदा मुझे कह दिया,

स्याही भी सूख कर,

कब की ख़त्म हुई,

पन्नों ने भी वज़ुद अपना खो दिया।

और आवाज़ फ़िर एक आने लगी,

दिल को मेरे समझाने लगी,

कि सफ़र यहीं ख़त्म कर दे,

अब ज़िंदगी की इस किताब को,

तू यहीं ख़त्म कर दे।



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