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यादों की किताब

LALBAHADURLALBAHADUR March 12, 2022
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कल बड़े दिनों बाद यादों की किताब खुली
थोड़ी पुरानी हो गई थी..थोड़ी धूल जमी थी

कुछ पन्ने पलटने के बाद ये एहसास हुआ
जो मै था कभी अब वो हूं नहीं
और मैं जो हूं अभी वो मै हूं ही नहीं

उसमे
पुराने कुछ सपने मिले
कुछ पराए कुछ अपने मिले
कुछ रिश्ते सच्चे मिले
कुछ धागे कच्चे मिले

ढेर सारी बीती बातें मिली
कई सारे वादे मिले
कुछ कहानियां मिली
कुछ खबरें मिली

थोड़ी खुशियां मिली..
थोड़े मुस्कुराते हुए गम
थोड़ी जीत थोड़े हार मिले

थोड़ा गुजरा हुआ पल मिला
कुछ गुजारे हुए पल मिले
जेहन के कुछ सवाल मिले
जिंदगी के दिए कुछ मलाल मिले
कुछ उम्मीदें मिली
कुछ अधूरी ख्वाहिशें मिली


थोड़ा आवारगी थोड़ा पागलपन थोड़ी सादगी मिली...
थोड़ी तन्हाई थोड़ी बेचैनी
और इन सब के बीच थोड़े हम मिले...

फिर मिली तुम इन सब से परे
बेफिक्र हस्ती हुई
तुम्हारी हल्की सी वो मुस्कुराहट भी मिली
तुम्हारी अठखेलियं तुम्हारी नादानियां

ये सब
वहीं एक पन्ने पर तुम्हारी तस्वीर मिली
तुम्हारी बेपरवाही मिली
बात बात पर तुम्हारा रूठ जाना मिला
तुम्हारी खामोशियां मिली
तुम्हारे कुछ चीखते दर्द मिले
तुम्हारी शिकायतें भी

तुम्हारी आंखों का झुकना भी था
तुम्हारा चलते चलते यूहीं रुकना भी था
तुम्हारे झुमके कंगन भी थे
तुम्हारे माथे की वो छोटी काली बिंदी भी थी
तुम्हारे मेहंदी वाले हाथ थे
तुम्हारे पाओ के काले धागे भी थे

उसीमे किसी पन्ने पर
थोड़ी नफरत मिली
थोड़ी मोहब्बत मिली
थोड़ा प्यार मिला
ढेर सारा इंतज़ार मिला
कुछ पक्के यार मिले
कुछ बोतले शराब मिली

कुछ पन्नों में घर से दूर था मै
फिर से मा बाप और वही परिवार मिला
और फिर जिंदगी की किताब
यूं ही आगे बढ़ती गई

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