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चाहा था मैंने न चाहा उन्होंने

LALBAHADURLALBAHADUR January 29, 2022
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*चाहा था मैंने न चाहा उन्होंने

फ़िर भी दूर बहुत दूर खुद से

*होते रहे हम,*


*मिले कभी तो मुस्कुरा दिए,

भीतर ही भीतर *रोते रहे हम,*


*अजब है ज़िम्मेदारियों का रँग भी,

रंगों में डूब बेरंग *होते रहे हम,*

खुद को ही खुद से *खोते रहे हम* !!

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