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जब आँखें नहीं आत्मा रोती है 

तब वह कविता लिखती है 

जब वह बारिश से नहीं आँसुओं से 

दामन भिगोती है 

तब वह कविता लिखती है 

जब वह किसी कारण बहुत खुश होती है 

हंसती है मुस्कुराती है 

तब वह कविता लिखती है 

जब वह समाज की विषमता से परेशान होती है

तब वह कविता लिखती है 

जब वह दुःख के पहाड़ को ढोती है

तब वह दर्द को शब्दों का जामा पहनाकर

धीरे धीरे अर्थ की गहराई में जाकर ...

लक्षणा और व्यंजना शक्ति का सहारा लेती है

तब वह कविता लिखती है ...

नव रसों, नंव भावों को जब वह लय में पिरोती है 

तब वह कविता लिखती है 

वह पाती है कविता दर्द में दवा बन जाती है 

और संसार की कोई भी समस्या का निदान 

बस कविताएं ही होती है 

जब असंभव सताने लगे ,

जब अंधेरा डराने लगे...

तब कविता ही चिराग़ जलाती है 

तब कविता ही हौंसला बढ़ाती हैं ..

सच कहा है किसी ने ये कविता ये गीत किसी 

दुआ से कम नहीं होते ...

अगर कविता न होती तो इतने रहमोकरम नहीं होते !!


©®कुसुम लखेड़ा

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