सावन's image
Share0 Bookmarks 55 Reads0 Likes

सावन

तुम गुजर चुके हो इस साल

तुम्हारे आने का सबब जानना चाहता हूँ।


पूरब में जो सूखी पड़ी है खेत

उसे नहलाने आते हो,

या उत्तर की नदीओं की प्यास बुझाने।


जो जंगल हो चुके उन्मादी

उसे गले लगाने आते हो,

या विरह में जले प्रेमी को भीगाने।


तुम बेपरवाह प्रेमी हो

देर से पहुँचते हो धरती की बाँहों में।


तुम ईश्वर के दूत बनकर नहीं आते

न आसमान के प्रेमी बनकर

टूटकर बरसते हो दुःख में,

सुख में गरजकर निकल जाते हो।


बरसने के किस घड़ी में,

होता है ज़्यादा तक़लीफ़

दुःख में या सुख में

कब रिक्त होता है मन बरसकर

दिन में या रात में

तुम्हारे बूंदों से किसे मिलती है ज़्यादा नमी

प्रेमी को या प्रेमिका को,

सभी रहस्यों को छोड़कर तुम चले जाते हो।



तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में

आँखें पथराई होती है

तुममे भीगकर मुक्त होना चाहताआँसुओं से भर चुके मेरे आँख।


तुम अकारण नहीं आते

तुम आते हो

अपने आँसुओं के बारिश से

हमारे आँखों में छुपे दर्द को दूर करने।


― कुन्दन चौधरी


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts