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किताब और गुलाब

अभिनीतअभिनीत September 4, 2022
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कुछ बातें अंदर ही दबी रह जाती हैं.. 
किसी पुरानी किताब में सूख चुके गुलाब के जैसी, 
उनका सतह पर आना उतना ही कठिन हो जाता है.... 
जितनी किसी सिगरेट के कश से मन के उलझनों का बच पाना, 
परंतु एक प्रश्न छोड़ जाती है वो आखिरी कश के साथ,
क्या संभव नहीं है.... 
उस वर्षों से फेंकी हुई पुस्तक से.... 
पुनः गुलाब के पंखुड़ियों का खिल जाना, 
क्या इतना मुश्किल हो जाता है.... 
अपनी पुरानी खोई पहचान को वापस पाना..... 
कि उसके लिए कविता लिखनी पड़े!

~ अभिनीत

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