प्रेम's image
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 तुमने प्रेम गढ़ा, 
मैंने तुम्हें चुना...
      मैं ढलती गई उसके अनुसार,
      और तुम्हारे प्रतिमान बदलते गए...
मेरी कोशिशें जारी रही,
तुम्हारी परिभाषाएं भी बदलती रहीं...
      और अंत में; 
जब तक मैं पूरा बदल पाई खुद को
तुम्हारा गढ़ा प्रेम कुछ और ही था...

फिर मैंने जाना;
कि... प्रेम का कोई प्रतिमान नहीं होता,
कोई नियम, कोई परिभाषा नहीं होती,
वह अनंतकाल से केवल प्रेम ही था, है और रहेगा!

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