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काँपे सारा बदन सिहर उठता है मन

Krishna Kant TenguriaKrishna Kant Tenguria December 23, 2021
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हे ईश्वर करो कोई ऐसा जतन
करो बंधन समाजों के कुछ तो खतम |

हैं बड़ी रूढ़ियाँ शर्माती छोरियाँ
पौरुष मन की हैं ये जिस्म की गोटियाँ |
मन चाहे तभी जी भर खेलते, 
कैसे तोड़ें समाजों की ये बेड़ियाँ ||

ना छोड़े सगे ना पड़ौसी भाई, 
मनोरंजन बनी है रिश्तों की खाई |
थाने - कचहरी - कानून - कायदे
न माँ और पिता में दिखी चतुराई ||

काँपे सारा बदन सिहर उठता है मन
याद आयें जो लंपट पुरुषों के करम |
ऐसी काम वासना लेकर पैदा हुए, 
जनम लेते ही मरते न आती शरम ||

दो न्याय इन्हें तोड़ो बंधन सभी, 
दोष देगा न कोई लड़की को कभी |
ख़िलाफ़त में उठे जो कोई सर तो फिर, 
करो धड़ से अलग होगा न्याय वही ||

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