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कठपुतली की हंसी

Kamal JoshiKamal Joshi April 12, 2022
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टूटी बेदम दीवारों को
सपनों का महल बनाने की कशमकश में
भूल गया था उस बारिश को
जिसमें कागज की नावों संग खेला करता था
छोड़ आया था उस हवा को
जिसमें बेफिक्री के साथ पतंगे तैरा करती थी।
टटोल रहा था
वसीयतों की, बन्द पड़ी उन सन्दूकों को
संभाल रखा था जिनमें उम्मीदों के कुछ सवालों को
बहुत जोर आजमाईश की किस्मत ने
फिर भी खोल ना पाया पत्थर हो चुके उन जवाबों को।
अलमस्त हुआ करता था कभी
अजनबी बना फिर रहा हूं अपने ही शहर में
जहां टूट चुकी है मिट्टी भी घूप के कहर में
सुलझा रहा हूं अपने ही अर्न्तमन के टकराव को
ढूंढ रहा हूं गमलों में बगीचों की छांव को।
फिर एक दिन कदम रखा
अपने गांव की बंजर हो चुकी जमीन पर
कई सवाल हुए मुझसे मेरे ही यकीन पर
होश आया जब एक सूखी लकड़ी पांव में फंसी
मैं ही तो था वह कठपुतली
बिन डोर नाच रहा जो, खोखली थी जिसकी हंसी।।

..... कमल जोशी .....


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