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⚙️ प्रकाश-छाया ⚙️

khatuniajotsnakhatuniajotsna May 21, 2022
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कविता - प्रकाश-छाया
 कवि - जोत्सना जरी

 .

 दर्द के शोर को छोड़कर
 चलो घूमें
 दूसरे क्षितिज की तलाश में

 .
 बिना भाषा के सिर्फ हवाएं बोलती हैं
 वे बेतरतीब ढंग से उड़ते हैं
 बालों में

 .
 सूर्योदय और सूर्यास्त के रंगों में
 नदी पड़ी है
 साफ-सुथरे बैंक पर
 धूप-छाया पक्षी चला जाता है

 .
 यह जीवन बस यादृच्छिक
 एक लापरवाह खेल




 .

 [एनबी-

 धूप-छाया बंगाली शब्द है।
 यह एक अलग छाया रंग है।  ]




 

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