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दीवाना खो गया है महबूब की गली में

Khalid NadeemKhalid Nadeem December 20, 2021
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रस्ता मिला न मंज़िल रहबर की रहबरी में ।

हम यूँ भटक रहे हैं सहरा-ए-जिंदगी में ।।


तुम तैर कर तो देखो सूखी हुई नदी में ।

फर्क़ आएगा समझ में खुश्की में और तरी में ।।


शौक़-ए-तलब की शायद मेराज हो गई है ।

दीवाना खो गया है महबूब की गली में ।।


फूलों की खुशबूओं से महरूम है जो अब तक ।

वह शाख़ आ गई है एहसास-ए-कमतरी में ।।


खुशियाँ मना रहे हैं कंदील के उजाले ।

हम आ गए हैं जब से आगोश-ए-तीरगी में ।।


साग़र में और सुबू में पाई कहाँ वो लज्ज़त ।

जो लुत्फ़ हमने पाया आँखों से मैकशी में ।।


जिस वक्त मेरी आँखें देखेंगी उस के जलवे ।

हो जाएगा इज़ाफ़ा आँखों की रौशनी में ।।


कहते हैं ये नजूमी पढ़ कर किताब-ए-हस्ती ।

नाकामियां लिखी हैं 'ख़ालिद' की जिंदगी में ।।

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