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आईनों का रूप जब से बेवफ़ा होने लगा

Khalid NadeemKhalid Nadeem November 23, 2022
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आईनों का रूप जब से बेवफ़ा होने लगा

आदमी की क़ुरबतों में फासला होने लगा


गुफ़तगू कुछ ग़म के पहलू पर भी करते अक़रबा

इक तबस्सुम पर हमारे तबसरा होने लगा


फसले गुल की ज़ाफ़रानी लज़्ज़तें जाती रहीं

चाहतों का हर शजर जब खोखला होने लगा


एक सच्ची बात मैं ने क्या लबों से चूम ली

कड़वा-कड़वा हर ज़बाँ का ज़ायका होने लगा


शहरों तक महदूद था बस शोअला बारी का मिज़ाज

अब गाँव में भी रतजगा होने लगा


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