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अब तो हवेलियों के भी आसार मिट गए

Khalid NadeemKhalid Nadeem November 25, 2022
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आ कर हमारे शहर की ज़ुल्मत मिटाए कौन

हर घर में इक उमीद का दीपक जलाए कौन


चारा गरों ने हाथ में तिरयाक ले लिया

मरहम हमारे ज़ख़्मों पे आ कर लगाए कौन


मैकश यही तो सोच के ज़हराब पी गए

साक़ी सुबू के जाम के नख़रे उठाए कौन


भँवरे तो बरहमी के सबब उड़ गए तमाम

कलियों को आशिक़ी के तराने सुनाए कौन


अब तो हवेलियों के भी आसार मिट गए

गुज़रे हुए ज़माने के किस्से सुनाए कौन


हर शख़्स मेरे शहर का माज़ूर हो गया

दुनिया के सूरमाओं को मिट्टी चटाए कौन


आँखों के साथ-साथ समाअत भी मिट गई

दीदावरी के फ़िक्र के मंज़र दिखाए कौन


'ख़ालिद' नहीं है कोई भी आराइश-ए-ख़्याल

महर-ओ-वफा ख़ुलूस की बस्ती बचाए कौन


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