मोहभंग's image
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याद है
जब पहली बार
धोखा मिला था
गैरों से
महसूस हुआ था
अंदर से सब कुछ हिलता हुआ
छाती फट गई थी
आसमान हिल गया था
झनझना गया था 
अंतर तक कोंना कोंना
हिल गई थी दुनियां

और तब हमने तय किया था
अपनों के बीच लौट जाना

हमने भी कैसे कैसे
सपने देखे थे
अपनों को खुश रखना था
बहुत प्यार देना था
कुछ अपनापन पाने के लिए

हर मन का भेद
बता देना था
हर हाल में रिश्ते
संजो संजो कर रखना
चाहा था बहुत
शिद्दत से चाहा था

अपनों को बहुत अपना माना
हर मनभावन उपहार
अपनों को दे दिया
अपना समय दे दिया
अपना सुख दुख साझा कर लिया

समय क्या बदला
वही लोग बदल से गए
छोटी छोटी बातों पर
उखड़े उखड़े से लगे

याद है!
जब पहली बार
अपनों से धोखा खाया
स्तंभित से शब्द
क्या कहें, बस धरती ही फटनी बाकी थी
लेकिन ऐसा नहीं हुआ

फिर जैसे धोखे मिलते गए
कभी गैरों से कभी अपनों से
फिर न धरती हिली न आसमान
बस अपने आसपास
कुछ साए से दिखते थे
बड़ी बड़ी खतरनाक आंखों से
घूरते हुए, 

मेरी चीखें बस हलक में
आज भी अटकी हैं
कभी फुरसत से
अकेले में जरूर चीखूगा
इतने ज़ोर से
कि ब्रह्माण्ड हिल जाए!
     

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