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ऐ ख़ुदा


ऐ ख़ुदा मैंने दिल से की तेरी बंदगी, माना तेरा हर हुक्म

फिर क्यों फैला है य ज़ुल्मत-सरापा ।

है मेहरूम क्यों मेरी आस्ता तेरे नावाज़ से ,

तूने ही तो कहा था कि रहबर बनकर हर लम्हा तू मेरे साथ है ,

फिर मेरी सदा सुनकर भी तू क्यों नही आया,

मैं कुछ नही पूछुंगी तुझसे फ़कत इतना बात दे,

की इस ख़ुदग़र्ज़ दुनियां की तरह तू भी हो गया ।


©️ काव्या शेखर


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