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न जाने क्युँ इतना अंँधेरा है?

Kavya SafarKavya Safar December 29, 2022
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जुगनुओं का भी नहीं बसेरा है,

अभी दूर बहुत सवेरा है,

कोई तो रोशनी दिखाओ

न जाने क्युँ इतना अंँधेरा है?


दाँयें हाथ को

बाँये की नहीं ख़बर है,

रूठी हुई नज़र है,

लग रहा है मानो

सोया पूरा शहर है,

किसे बताएंँ कि

खो-सा गया मेरा डेरा है,

मैं ढूँढू किन निगाहों से

चाँद भी आज़ नहीं मेरा है,

कोई तो रोशनी दिखाओ

न जाने क्युँ इतना अंँधेरा है?

~राजीव नयन


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