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Romantic PoetryPoetry1 min read

क्या सचमुच मेरे सामने ही खड़ी हो तुम!

Kavya SafarKavya Safar February 14, 2022
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मेरे स्वप्नों से निकली इक परी हो तुम,

क्या सचमुच मेरे सामने ही खड़ी हो तुम!


जो कहना मुझे है मैं कैसे बताऊँ?

तुम्ही कह दो कि मैं क्या गुनगुनाऊँ?

चाँदनी-सी,दमकती रोशनी से भरी हो तुम,

क्या सचमुच मेरे सामने ही खड़ी हो तुम!


तुम मुस्कुराती तो मौसम मुस्कुराए,

तुझे देखकर कुसुम भी लजाए,

पर्वत से गिरते झरने-सी झड़ी हो तुम,

क्या सचमुच मेरे सामने ही खड़ी हो तुम!


पत्थर आज मोम-सा पिघल रहा है,

चारों तरफ़ आज सरगम-सा बज रहा है,

पहली भी हो,आख़िरी भी हो तुम,

क्या सचमुच मेरे सामने ही खड़ी हो तुम!

मेरे स्वप्नों से निकली इक परी हो तुम।।

~राजीव नयन


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