प्रेम की पोथी पर प्रताड़नाओं की प्रस्तावना क्यों? - अतुल कनक's image
OpinionArticle8 min read

प्रेम की पोथी पर प्रताड़नाओं की प्रस्तावना क्यों? - अतुल कनक

OpinionOpinion February 14, 2022
Share0 Bookmarks 791 Reads8 Likes

कहते हैं कि आदम और हव्वा में स्वर्ग में एक ऐसा फल खा लिया जिसे खाना वर्जित था। परिणाम यह हुआ कि उन्हें स्वर्ग से धकेल दिया गया। माना जाता है कि आदम दुनिया का पहला पुरूष था और उसने जो फल खाया था - वह प्रेम का फल था। प्रेम का फल खाने की सज़ा केवल आदम और हव्वा को ही नहीं मिली बल्कि अनगिनत लोगों ने प्रेम के प्रतिदान में उन प्रताड़नाओं को पाया है, जो प्रताड़नाऐं किसी के भी मनोबल को तोड़ सकती हैं। लेकिन प्रेम भी अद्भुत अनुभूति है। जब यह किसी के अंतस में जागृत होती है तो न प्रताड़नाओं की चिंता होती है, न प्रतिबंध डराते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जिस अनुभूति को दुनिया की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति माना गया है- जिस अनुभूति को जीवन का मंगलाचरण कहा जाता है, उस प्रेम के प्रति दुनिया का इतना दुराग्रह क्यों है?

कहते हैं कि रूक्मणि अपने माता- पिता की इच्छा के विपरीत श्रीकृष्ण से विवाह करना चाहती थीं। यह वह दौर था जब सामर्थ्यवान परिवार भी अपनी बेटियों को अपनी पसंद का वर चुनने की स्वतंत्रता देते थे। स्वयंवर इसी स्वतंत्रता का एक उदाहरण है। कृष्ण को तो यों भी अपने समय के सबसे धीरोदात्त नायकों में एक माना जाता है। ऐसे व्यक्ति से बेटी का विवाह होना किसी भी परिवार के लिये सुख और गौरव का विषय हो सकता था। लेकिन रूक्मणि को अपने प्रिय से विवाह करने के लिये प्रतिकूल परिस्थितियों से व्यतीत होना पड़ा। भारतीय वांग्मय में अनेक प्रेमकथाऐं हैं। लेकिन अधिकांश पात्रों को सुखपूर्ण जीवन जीने के लिये प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और यह स्थिति तो उस समाज की रही, जिसमें राधा और कृष्ण के प्रेम को भक्ति का प्रणेता माना गया। महत्वपूर्ण है कि राधा श्री कृष्ण की पत्नी नहीं थी, प्रेयसी थी। पत्नी तो वह रायण नाम के गोप की थी।

प्रेम प्रसंगों की प्रताड़ना के अनेक उदाहरण हैं। कहानी चाहे सलीम -अनारकली की हो या हीर - रांझा की, सोहनी- महिवाल की हो या लैला मजनूं की। प्रेम तो एक मटकी के सहारे भी अपने प्रिय से मिलने के लिये चढ़ते हुए दरिया में उतर जाता हैॅ, लेकिन दुनिया को यह मिलन रास नहीं आता और वो सोहनी की मटकी को कच्ची मटकी से बदल देती है। कभी वो अनारकली को जिन्दा दीवार में चुनवा दिये जाने का हुकुम देती है तो कभी मजनूं को पत्थरों से पीटे जाने की सज़ा सुनाती है। कुछ दिन पहले जयपुर में एक पिता ने सुनियोजित तरीके से अपनी बेटी के घर जाकर उसके पति को गोलियों से भून दिया था। कसूर दोनों का सिर्फ इतना था कि दोनों ने प्रेम विवाह किया था। खाप पंचायतों के कारण न जाने कितने युवक-सुवती फंदों पर लटकने को विवश हुए हैं। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में तो प्रेम के प्रति दुराग्रह का एक बहुत ही विचित्र प्रसंग सामने आया है। जिले के ग्वाटोली ग्राम में अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाले एक दंपत्ति और इस विवाह को स्वीकार करने वाले परिवार को जाति से बाहर निकाल दिया गया। बाद में कहा गया कि यदि विवाह करने वाली लड़की गोबर का सेवन कर लेती है तो परिवार को जाति में वापस ले लिया जाएगा। एक पूरी जातीय पंचायत का यह फरमान न केवल प्रेम के प्रति समाज के दुराग्रह का प्रमाण है, अपितु एक पूरे समूह की मानसिक विकृति का द्योतक भी है। भीड़ अपनी कुंठा को ऐसी ही विकृतियों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है और भीड़ की ऐसी उद्घोषणाओं में विवेक कम दुराग्रह और कुंठा का बोलबाला अधिक होता है। दंपत्ति ने इस मामले की रिपोर्ट पुलिस में की है और पुलिस प्रकरण की जांच कर रही है। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

करीब बाईस साल पहले जब मैंने अपनी पसंद की लड़की से अंतर्जातीय विवाह किया था, तब मुझे भी अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था और यह तो तब हुआ था जब मेरे श्वसुर जी उन दिनों अपनी उसी पुत्री के लिये योग्य वर की तलाश में परेशान हो रहे थे। हो सकता है कि उनकी कसौटी पर मेरी योग्यता कहीं कुछ कम रही हो लेकिन उनकी पुत्री मुझसे हर कीमत पर विवाह करना चाहती थी, क्या यह तथ्य महत्वपूर्ण नहीं था। यह ऐसा परिवार था जिसमें राधा-कृष्ण की नियमित पूजा तो होती थी लेकिन पुत्री के लिये प्रेम का प्रगटीकरण वर्जित था। हम कैसे समाज में रह रहे हैं- जहाँ युवाओं को कबीर की यह शिक्षा पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती है कि ढाई आँखर प्रेम का पढ़े सेा पंडित होय- लेकिन कोई प्रेम के आँखर बाँचने लगे तो उसे पापी करार दे दिया जाता है। मेरे एक परिचित परिवार में तो और भी विचित्र वाक़या हुआ। पूरा परिवार जिस लड़के के साथ अपनी बेटी का विवाह करने के बारे में सोच रहा था, उसी लड़के ने जब आगे होकर यह कह दिया कि वह उनकी बेटी से विवाह करना चाहता है तो भाई ने गालीगलौच प्रारंभ कर दिया।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रेमविवाह में पैदा होने वाली प्रतिकूलताओं के दो कारण हो सकते हैं। एक कारण तो यह है कि लड़का- लड़की जब आपस में स्वयं ही विवाह का निर्णय करते हैं तो परिवार के बुजुर्गों को लगता है कि उनके वर्चस्व को चुनौती दी गई है। यह प्रतीति उनके अंदर ‘नकारे जाने का दर्द’ पैदा करती है और इससे जनित कुंठा सिर्फ विरोध में ही सुख पाती है। दूसरा कारण यह है कि अक्सर अपनी मर्जी से विवाह करने वाले युवक- युवती परिवारों को सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं जबकि पारंपरिक विवाह के लिये आज भी लड़के या लड़की के परिवार को अपनी संतति हेतु योग्ष्य जीवनसाथी चुनने के लिये चयन से लेकर तमाम इंतजामों तक न केवल खूब मेहनत करनी होती है, अपितु अनाप शनाप धन का भी व्यय करना होता है। सहजता से उपलब्ध होने वाली वस्तु को हमारे यहाँ अक्सर फोकटिया मान लिया जाता है और फोकटिया वस्तुओं को अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता। अलंकार की भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि अनाहूत अतिथियों को अपेक्षित अभिशसा उपलब्ध नहीं होती। यह सहज उपलब्धता ही प्रेम करने वालों के लिये दुनिया को दुश्मन बना देती है। शायद ऐसी ही किसी उपेक्षा से गुज़रते हुए ग़ालिब ने लिखा हो- ‘‘इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया/ वरना हम भी आदमी थे काम के।’’

प्रेम के बारे में कहा जाता है कि -‘‘यह इश्क़ नहीं आसाँ, बस इतना समझ लीजे/ इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है।’’ क्या कमाल है कि प्रेम करने वाले सच को जानते हुए भी इस आग के दरिया में कूद पड़ते हैं।


अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।



Note: The views expressed are the author's own. The opinions and facts expressed here do not reflect the views of Kavishala and Kavishala does not assume any responsibility or liability for the same.



No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts