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‘‘अत्र कुशलं तत्रास्तु’’ - अतुल कनक

OpinionOpinion January 6, 2023
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‘अत्र कुशलं तत्रास्तुू।’ नई पीढ़ी को इस वाक्यांश से कुछ याद आए या नहीं आए लेकिन जिन लोगों का जन्म सत्तर के दशक में या उसके पहले हुआ है, उनके लिये संस्कृत का यह छोटा सा वाक्यांश अनगिनत यादों के झरोखे खोल देता है। अत्र कुशलं तत्रास्तु का शाब्दिक अर्थ है कि यहाँ सर्वकुशल है और वहाँ भी ऐसा ही हो। अस्सी के दशक के अंत तक लोग जब पत्रों के माध्यम से परस्पर संवाद करते थे, तब बहुधा चिट्ठियों की शुरूआत या तों इस वाक्याश के साथ होती थी या फिर ‘यहाँ पर सब कुशल है। उम्मीद है वहाँ भी सब कुशलपूर्वक होंगे। आगे हाल यह है कि....’’ जैसे वाक्यों से होती थी।

प्रायः घर के हर सदस्य के हाथ में पहुँच गये मोबाइल फोन और त्वरित संवाद के अन्य माध्यमों ने लोगों से इंतज़ार का वह मीठा सुख छीन लिया है जो चिट्ठी के माध्यम से किसी प्रियजन की कुशलक्षेम प्राप्त करने में मिलता था।

यह वह दौर था,जब टेलीफोन आभिजात्य होने की निशानी समझा जाता था। टेलीफोन का एक कनेक्शन पाने के लिये लंबा इंतज़ार करना पड़ता था और वीआईपी कोटे की वरीयता पाने के लिये लोग अपने अपने तरीके के जुगाड़ भी किया करते थे। अस्सी के दशक के मध्य तक तो टेलीफोन घर पर लग जाने के बावजूद किसी अन्य शहर में रहने वाले रिश्तेदारों से बात करना बहुत आसान नहीं हुआ करता था। लोगों को ट््रंककॉल बुक करवाकर अपनी लाइन मिल जाने की प्रतीक्षा करनी होती थी और बातचीत के तीन मिनिट बीत जाने के बाद ऑपरेटर बात काटकर पूछ लिया करता था कि आप अपनी बात जारी रखना चाहते हैं या नहीं। उन दिनों टेलीफोन एक्सचेंज के ऑपरेटर द्वारा ट््रंककॉल पर की जाने वाली वार्ताओं को सुनने के संबंध में भी अनेक रोचक किस्से पुराने लोग सुनाते हैं। जब देश में एसटीडी सेवाऐं शुरू हुईं तो जगह जगह पीसीओ खुल गये। बहुूत से लोगों को रोजगार मिला। चूँकि रात को सात बजे बाद बात करने पर कॉलरेट कम हो जाया करती थी, तो सात बजे बाद लोगों को एसटीडी पीसीओ बूथ के बाहर लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते देखा जा सकता था। इस दौर में जिन लोगों के यहाँ टेलीफोन नहीं हुआ करते थे, वो अक्सर पी.पी. नंबर का इस्तेमाल किया करते थे। पी.पी. नंबर का अर्थ कुछ लोग ‘पड़ौसी का फोन’ बताया करते थे।

ल्ेकिन फिलहाल बात चिट्ठियों की। निश्चित रूप से चिट्ठियों की शुरूआत अपने प्रियजन तक संदेश पहुँचाने की आवश्यकता और आकांक्षा के कारण ही हुई होगी। प्राचीनकाल में चिट्ठियाँ भेजना सहज नहीं था। राज्य के घुड़सवार आवश्यक पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया करते थे। कुछ व्यापारिक संगठन भी सशुल्क ऐसी सेवाऐं देते थे। गुप्तचरों औरडाकुओं द्वारा पत्रवाहकों को रोककर मार दिया जाना आम बात हुआ करती थी। लोगों ने कबूतरों का भी इस्तेमाल पत्रवाहक के तौर पर किया। कालीदास के मेघदूत में मेघ नायक का संदेशा लेकर दिगंत तक यात्रा करता है।

ब्हुत पुरानी बात नहीं करें तो भी साढ़े तीन दशक पहले तक का चिट्ठियों का ढंग नई पीढ़ी के लिये बहुत रोचक हो सकता है। पोस्टकॉर्ड, अंतर्देशीयपत्र और लिफाफों का उपयोग लोग अपनी अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार किया करते थे। पोस्टकॉर्ड कुशल समाचार भेजने का सबसे सस्ता साधन था। आज भी पोस्टकॉर्ड और अंतर्देशीय अस्तित्व में हैं लेकिन लोग उनका उपयोग अपवाद स्वरूप ही करते हैं। हिन्दी के दिग्गज कवि हरिवंश राय बच्च्न और हिन्दी कवि मंचों के लोकप्रिय कवि बालकवि बैरागी अंत तक निरंतर पत्र लिखते रहे। उनके लिखे पत्र कई लोगों के पास संग्रहित हैं।

दरअसल, हिन्दी साहित्य में तो पत्र लेखन को एक स्वतंत्र विधा का दर्जा प्राप्त है। दुनिया भर में पत्र लेखन को बहुत गंभीरता से लिया जाता रहा है। विशिष्ट विद्वानों के मध्य हुए परस्पर पत्र- व्यवहार के महत्वपूर्ण संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। कुछ पत्र अपने कथ्य के कारण बहुत चर्चित हुए हैं। अब्राहम लिंकन का अपने बेटे के नाम लिखा पत्र इसका एक उदाहरण है। आज भी इस पत्र को पिता- पुत्र के परस्पर रिश्ते की गरिमा और पिता द्वारा बेटे को दी जाने वाली सीख के संबंध में प्रमुखता से उल्लेख किया जाता है। पत्र किसी व्यक्ति का मार्गदर्शन करने और अपनी मंज़िल की दिशा में बढ़ने को प्रोत्साहित करने का अद्भुत माध्यम रहे। आमआदमी ‘सफेद सफेद चावल मैं कूट कूट कर धोता हूँ/ बहन तुम्हारी याद में मैं, फूट फूट कर रोता हूँ’’ जैसी तुकबंदियों से अपनी बात को रोचक बनाने का प्रयास करता था तो कई बार लोग फिल्मी गीतों के मुखड़े भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते थे। रागदरबारी नामक उपन्यास में श्रीलाल शुक्ल ने बहुत ही रोचक वर्णन किया है कि किस तरह गाँव का एक लड़का अपने मन की बात को कहने के लिये कागज पर कुछ फिल्मीगीतों के मुखड़े लिखकर अपने प्रेम का भरोसा अपनी प्रिया को जताता है। चूँकि पत्रों को लिखते समय भावों को प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त किया जा सकता है, इसलिये प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिये सारी दुनिया में पत्रों ने रोचक भूमिका निभाई। खुशबू में भीगा गुलाबी रंग का कागज खाली होकर भी क्या क्या कह जाता था, इसे केवल वही महसूस कर सकता है जिसने उस सुख को अद्भुत किया हो।

लेकिन प्रेमपत्रों की तो एक पूरी दुनिया है। उसकी चर्चा फिर कभी।

अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

Note: The views expressed are the author's own. The opinions and facts expressed here do not reflect the views of Kavishala and Kavishala does not assume any responsibility or liability for the same.

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