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जन-जन की आशा की भाषा है हिन्दी - अतुल कनक

OpinionOpinion September 14, 2021
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भाषाऐं हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक जीवन की प्रतीक भी होती हैं। किसी भी भाषा समुदाय का दीर्घ अनुभव उसकी अभिव्यक्ति में परिलक्षित होता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि हिन्दी हमारी सांस्कृतिक शुचिता का प्रतीक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि हिन्दी भाषियों द्वारा उपयोग में लिये जाने वाले सभी अपशब्द हिन्दी से इतर भाषा के हैं। हिन्दी भाषा में तो कोई गाली है ही नहीं। शायद इसलिए कि गालियाँ हिन्दी के संस्कारों का संवहन करने की सामर्थ्य नहीं रखती। हिन्दी रसखान, कबीर, मीरा, तुलसी, सूर, जायसी, विद्यापति, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त या सुमित्रानंदन पंत, बच्चन, रेणु, दिनकर जैसे संस्कृति संवर्धकों की भाषा रही है। इस भाषा में कलुष का स्पर्श संभव ही नहीं था। शायद यही कारण रहा कि देश की आजादी के बाद जब संविधान सभा की बैठकें हुईं तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विदी, काका कालेलकर, राजेन्द्र सिंहा जैसे विद्वानों ने हिन्दी को उसका यथोचित सम्मान दिलाने के लिये राष्ट््रभाषा का दर्जा दिये जाने की माँग की। हालाँकि संविधान में हिन्दी को राष्ट््रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया लेकिन 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी भाषा को भारत में राजकाज की अधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया और यह निर्णय ही हिन्दी दिवस के आयोजन की आधारशिला बनी। संविधान का अनुच्छेद 343 और भाग 17 अधिकारिक भाषा के बारे में स्थिति स्पष्ट करते हैं जबकि अनुच्छेद 351 राजय को निर्देशित करता है कि वह हिन्दी को लोकप्रिय बनाने, उसे संरक्षण देने और उसके उपयोग को प्रोत्साहन देने की दिशा में जिम्मेदारी से कार्य करे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमारे लोकतंत्र ने जिन विसंगतियों को सर्वाधिक सहन किया है, उनमें एक यह भी है कि महत्वपूर्ण मसलों पर भी सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली केवल लकीर को पीटने वाली रहती है। हिन्दी के संरक्षण या हिन्दी को प्रोत्साहन के लिये जिन नवाचारों की आवश्यकता थी, उन्हें समुचित तौर पर नहीं अपनाया गया या फिर सामर्थ्यवान लोगों ने उपलब्ध हुए अवसरों को रेवड़ियों की तरह इस तरह बाँटा कि राजस्थान के पिछले दौर के महत्वपूर्ण कवि जमना प्रसाद ठाड़ा राही को एक गीत में लिखना पड़ा - नारों के बल नाव नहीं, चल सकती कभी पठारों पर/ कितने ही जयघोष लिखें हम पत्थर की दीवारों पर।’’

भले ही हिन्दी को संरक्षण देने की दिशा में किये गये सरकारी प्रयास अपनी अभीष्ट भूमिका नहीं निभा सके हों लेकिन जन-मन में हिन्दी की जो पैठ है वह हिन्दी की सबसे बड़ी शक्तियों में एक है। इसीलिये हिन्दी को आमआदमी की उम्मीदों की भाषा भी कहा जा सकता है। आँकड़े हिन्दी को करीब 43 करोड़ लोगों की भाषा बताते हैं लेकिन हिन्दी का संसार इन आँकड़ों से भी व्यापक है। फिजी, मारीशस, त्रिनिदाद, टौबेगो, गुयाना, नेपाल और सूरीनाम जैसे देशों में हिन्दी अधिकारिक भाषा है। कनाडा, अमरीका, ग्रेट ब्रिटेन और अरब देशों में भी हिन्दीभाषी बड़ी संख्या में हैं और यही कारण है कि इन देशों में हिन्दी कविसम्मेलन आयोजित होते रहते हैं। मॉरीशस में तो विश्व हिन्दी सचिवालय नाम से एक संस्था का संचालन किया जाता है। हिन्दी की कई महत्वपूर्ण पत्रिकाऐं विदेशों से छपती हैं। अंतरजाल (या इंटरनेट) पर तो हिन्दी की पत्रिकाओं, हिन्दी ब्लॉग, हिन्दी पोर्टल और हिन्दी सामचारपत्रों की एक बड़ी संख्या है। सोशल मीडिया पर बढता हुआ हिन्दी का प्रयोग हिन्दी की शक्ति का सबसे बड़ा परिचायक है।

... और हिन्दी की ये उपलब्धियाँ इन परिस्थितियों के बावजूद हैं कि हिन्दी के प्रोतसाहन के लिये जिम्मेदार संस्थाओं द्वारा अपनी भूमिका का निर्वहन तत्परता से नहीं किया गया, स्वयं को आभिजात्य समझने वाला देश का एक बड़ा वर्ग आज भी अंग्रेजी बोलने में ही शान समझता है या राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिये इसी देश के कई हिस्सों में हिन्दी का मुखर विरोध परंपरा बन गया है। जब कोई व्यक्ति अपने विरोध को ही अपनी प्रगति की प्रेरणा बना लेता है तो उसकी प्रतिभा पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले कुंठित होने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। हिन्दी ने भी अपने विरोध को अपनी ताकत बनाया है। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि हिन्दी भाषा ने बहुत ही सहजता के साथ फारसी, चगताई, अरबी, तुर्की, अंग्रेजी और पुर्तगाली के साथ कई देशज भाषाओं को भी आत्मसात किया है। महत्वपूर्ण यह है कि इतनी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करते हुए भी हिन्दी ने अपनी सांस्कृतिक शुचिता को बनाए रखा और इसीलिये यदि वह भूषण की कविता में वीर रस की वाहिनी बन जाती है तो सूरदास की कविता में वात्सल्य की सरिता की तरह प्रवाहित होती है।

यह हिन्दी की ही ताकत थी कि इसने गार्सा द तासी नामक यूरोपीय भाषाविद् को अपना पहला इतिहास लिखने के लिये प्रेरित किया। जब बाबू देवकी नंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता संतति’ का धारावाहिक प्रकाशन एक अखबार में शुरू हुआ तो लोगों ने इस उपन्यास को पढ़ने के लिये हिन्दी सीखी। चेकोस्लोवाकिया के डॉ. ओदोलन स्मेकल तो हिन्दी से इतने प्रभावित रहे कि उन्होंने न केवल हिन्दी भाषा का अध्ययन किया बल्कि बाद में उनकी हिन्दी कविताओं का एक संकलन भी प्रकाशित हुआ। आमजन में हिन्दी की पैठ को देखते हुए ही दयानंद सरस्वती ने संस्कृत छोड़कर हिन्दी में सत्यार्थ प्रकाश की रचना की और महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी दाँ गुजराती भाषी होते हुए भी जनजन तक अपनी बात पहुँचाने के लिये हिन्दी को ही अपनाया। हिन्दी जनता के मन की आशा है और आमआदमी की उम्मीदों की भाषा है इसीलिये बाजारवाद की सारी चुनौतियों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से उपजी विसंगतियों को झेलकर भी हिन्दी जनता के मन के सिंहासन पर विराजमान है 



अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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