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शायर आलोक श्रीवास्तव के 50 मशहूर शेर

KavishalaKavishala June 16, 2020
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ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,

मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं.


अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया,

मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं.


ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है,

नदी का साथ देता हूं, समंदर रूठ जाता है.


ग़नीमत है नगर वालों लुटेरों से लुटे हो तुम,

हमें तो गांव में अक्सर, दरोगा लूट जाता है.


जिसका तारा था वो आंखें सो गई हैं,

अब कहां करता है मुझ पर नाज़ कोई.


घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,

चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा.


बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक़सीम हुईं, तब-

मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा.


अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,

अम्मा जी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी.


कभी बड़ा सा हाथ ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन,

मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी.


मुझे मालूम है मां की दुआएं साथ चलती हैं,

सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है.


दिलों की बातें दिलों के अंदर ज़रा सी ज़िद से दबी हुई हैं,

वो सुनना चाहें, ज़ुबां से सब कुछ मैं करना चाहूं नज़र से बतियां


ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है,

सुलगती सांसें, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां.


हम उसे आंखों की दहलीज़ न चढ़ने देते,

नींद आती न अगर ख़्वाब तुम्हारे लेकर.


एक दिन उसने मुझे पाक नज़र से चूमा,

उम्र भर चलना पड़ा मुझको सहारे लेकर.


ऐसी भी अदालत है जो रूह परखती है,

महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक.


हर वक़्त फ़िज़ाओं में महसूर करोगे तुम

मैं प्यार की ख़ुशबू हूं, महकूंगा ज़मानों तक.


अगर नवाज़ रहा है तो यूं नवाज़ मुझे,

के’मेरे बाद मेरा ज़िक्र बार-बार चले.


ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार का है,

यहीं संभाल के पहना, यहीं उतार चले.


घर के बुज़ुर्ग लोगों की आंखें क्या बुझ गईं,

अब रोशनी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा.


आए थे मीर ख़्वाब में कल डांट कर गए,

क्या शायरी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा.


यही ख़याल तो दामन को थाम लेता है,

हम उठ गए तो तेरी अंजुमन का क्या होगा.


मैं उसमें नज़र आऊं, वो मुझमें नज़र आए,

इस जान की ख़ुशबू में, उस जान की ख़ुशबू हो.


बाज़ार जा के ख़ुद का कभी दाम पूछना,

तुम जैसे हर दुकान में सामान हैं बहुत.


आवाज़ बर्तनों की घर में दबी रहे,

बाहर जो सुनने वाले हैं, शैतान हैं बहुत.


नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है,

सोच समझकर घुलना-मिलना अपने रिश्तेदारों में.


चांद अगर पूरा चमके तो उसके दाग़ खटकते हैं,

एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़तदारों में.


जाने क्यूं मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते,

पलकों से लौटी हैं कितने सपनों की बारातें सच.


साला पांसा हर दम उल्टा पड़ता है,

आख़िर कितना चलूं संभलकर बम भोले.


दिल के’ जैसे पाक मरियम की दुआ,

उसके चेहरे पर कोई चेहरा नहीं.

 

सारा बदन अजीब सी ख़ुशबू से भर गया,

शायद तेरा ख़याल हदों से उतर गया.


उर्दू के इस ख़ुलूस को हम ढ़ूंढ़ते कहां,

अच्छा हुआ ये ख़ुद ही लहू में उतर गया.


जब भी चाहेगा छीन लेगा वो,

सब उसी का है आपका क्या है.


चांदनी आज किस लिए नम है,

चांद की आंख में चुभा क्या है.


अब नया पैरहन ज़रूरी है,

ये बदन शाम तक बदल दूंगा.


तुम मुझे रोज़ चिट्ठियां लिखना,

मैं तुम्हें रोज़ इक ग़ज़ल दूंगा.


बे-सदा काग़ज़ों में आग लगा,

आज की रात गुनगुना मुझको.

 

सफ़र की आज कैसी इंतेहा है,

मुसाफ़िर लौट जाना चाहता है.


मैं जिसे दिल से प्यार करता हूं,

चाहता हूं उसे ख़बर न लगे.


बस तुझे उस नज़र से देखा है,

जिस नज़र से तुझे नज़र न लगे.


हमारे सामने रिश्तों के ख़्वाब बिखरे हैं,

बहुत क़रीब से देखा है घर उजड़ता हुआ.


पीपल की छांव बुझ गई तालाब सड़ गए,

किसने ये मेरे गांव पर एहसान कर दिया.


मंडी ने लूट लीं जवां फसलें किसान की,

क़र्ज़े ने ख़ुदकुशी की तरफ़ ध्यान कर दिया.


सफलता के सफ़र में तो कहां फ़ुरसत की कुछ सोचेंट

मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है.


मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है,

नवम्बर याद आता है, दिसम्बर याद आता है.


गले में मां ने पहन रखे हैं महीन धागे में चंद मोती,

हमारी क़िस्मत का हर सितारा उस एक ज़ेवर से झांकता है.


थके पिता का उदास चेहरा उभर रहा है यूं मेरे दिल में,

के’ प्यासे बादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झांकता है.


लबों पे ख़ामोशियों का पहरा, नज़र परेशां उदास चेहरा,

तुम्हारे दिल का हर एक जज़्बा, तुम्हारे तेवर से झांकता है.


दो-इक दिन नाराज़ रहेंगे, बाबूजी की फ़ितरत है,

चांद कहां टेढ़ा रहता है सालों साल सितारों से.


वो शख़्स बड़ा है तो ग़लत हो नहीं सकता,

दुनिया को भरोसा ये अभी तो नहीं होगा.


कुछ और भी हो सकता है तक़रीर का मतलब,

जो तुमने सुना सिर्फ़ वही तो नहीं होगा.


हर बार ज़माने का सितम होगा मुझी पर,

हां; मैं ही बदल जाऊं कभी, तो नहीं होगा.



(साभार - आजतक)

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