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भूख और क़लम - कमल जीत चौधरी

KavishalaKavishala March 17, 2022
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मेरे पास एक रंगीन पतंग थी

जो हवा का रुख़ बदल

उड़ सकती थी

तुमने उसकी डोर थमा दी

झाड़ियों में बेर खाते बच्चों के हाथ

तुम बच्चे नहीं थे!

मेरे पास एक खिड़की थी

वह जिसमें खुलनी थी

तुमने उसी आसमान में सुराख़ कर

उसे सिर पर उठा लिया

मेरे पास एक नदी थी

जिसमें तुम रात भर

नाव खेवते रहे जी भर

जब सुबह होने को थी

तुमने नाव में पत्थर भर दिए

अब तुम

'नदी गहरी है' कहते हो

दूसरों को डराते हो

मेरे पास अनेक रंग थे

तुमने सुपर मॉडल के हाथों

एक आयातित रंग

मेरे रंगों में उड़ेल दिया

मेरी होली को ठेल दिया

तुमने ब्रश और कैनवास भी चुरा लिए

तुम जानते थे

मेरे पास ऐसी ऐनक है

जिससे छोटों और बड़ों में

घोड़ों और गधों में

फ़र्क़ दिखाया जा सकता है

इससे पहले कि मैं दिखाता

तुम गांधारी हो गए…

मेरी पंतग खिड़की नदी रंग और ऐनक

बेकार बनाकर

सूरज को अपना टायर बनाकर

तुम बहुत ख़ुश हो

पर तुम यह नहीं जानते

मुझे दानों, धागों, नीवों पर विश्वास है

भूख और क़लम अब भी मेरे पास है। 

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