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इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह

ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह

[अनवर शऊर]


इन्हीं ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा

अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है

[अख़्तर शीरानी]


कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं

नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है

[बेदम शाह वारसी]


कोशिश भी कर उम्मीद भी रख रास्ता भी चुन

फिर इस के बाद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

[निदा फ़ाज़ली]


ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

[अल्लामा इक़बाल]


चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है

जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते

[हफ़ीज़ बनारसी]


जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

[वसीम बरेलवी]


देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

[मजरूह सुल्तानपुरी]


न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

[राहत इंदौरी]


पैदा वो बात कर कि तुझे रोएँ दूसरे

रोना ख़ुद अपने हाल पे ये ज़ार ज़ार क्या

[अज़ीज़ लखनवी]


फ़राग़त से दुनिया में हर दम न बैठो

अगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा

[अल्ताफ़ हुसैन हाली]


बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो

ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो

[मीर तक़ी मीर]


मंज़िलें न भूलेंगे राह-रौ भटकने से

शौक़ को तअल्लुक़ ही कब है पाँव थकने से

[अदीब सहारनपुरी]


ये और बात कि आँधी हमारे बस में नहीं

मगर चराग़ जलाना तो इख़्तियार में है

[अज़हर इनाायती


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