पंच परमेश्वर : मुंशी प्रेमचंद's image
Poetry5 min read

पंच परमेश्वर : मुंशी प्रेमचंद

Kavishala ReviewsKavishala Reviews October 8, 2021
Share1 Bookmarks 62 Reads4 Likes

आज 8 अक्टूबर है। इसी दिन महान साहित्यकार ‘मुंशी’ प्रेमचंद जी का देहांत हुआ था। इसलिए हम ने सोचा कि आज हम लेखकों को उन्हें श्रद्धांजलि देनी चाहिए। इसलिए हम आपके सामने उनकी रचना के सारांश और समीक्षा प्रस्तुत करते है। हम ने जो कहानी चुनी है वह उनकी प्रसिद्ध कृतियों में से एक है,

“पंच परमेश्वर”।

सारांश: जुम्मन शेख और अलगू चौधरी बचपन से दोस्त थे। वे एक साथ नहीं खाते-पीते थे और धर्म भी अलग थे, लेकिन उनके विचार समान थे। यही उनकी दोस्ती का आधार था। जुम्मन की एक बूढ़ी खाला ‘मौसी’ थी। उसके पास थोड़ी सी जमीन थी। जुम्मन ने उन्हें फुसलाया और संपत्ति अपने नाम कर ली।

जब तक संपत्ति पंजीकृत नहीं हुई, जब तक रजिस्ट्री नहीं हुई, तब तक खाला का बहुत सम्मान था। रजिस्ट्री होते ही सब कुछ बदल गया। अब खाला को केवल सूखी रोटी खाने और कड़वे शब्द सुनने को मिलते थे। कुछ दिनों तक खाला ने सुना और सहा। जब वह और नहीं सह सकती थी, तो उसने जुम्मन से कहा कि मुझे हर महीने कुछ पैसे दे दो, मैं अलग से खा-पका लूंगी। लेकिन, जुम्मन माना कर दिया और खाला ने उसे पंचायत की धमकी दी। खाला ने सबको इकट्ठा किया और अलगू को भी पंचायत में आने को कहा। शाम को जब पंचायत हुई तो खाला ने आपबीती सुनाई और पंचों से न्याय मांगा। वह पंच के निर्णय को मानने के लिए तैयार थी। जब सरपंच चुनने की बारी आई तो जुम्मन ने भी कहा कि किसी को भी चुनो, मैं भी पंचो की बात मानने को तैयार हूं।

तब खाला ने अलगू को सरपंच बनाया। जम्मून खुश होगया की अलगू तो मेरा दोस्त है, जीत तो मेरी ही होगी। तब खाला ने अलगू को कहा, बेटा दोस्ती के लिए ईमान नहीं बेचा जाता। पंच ना तो किसी का दोस्त होता है, ना दुश्मन। पंच के दिल में ईश्वर बसता है, उनके मुंह से जो बात निकलती है वह ईश्वर की होती है। काफी देर तक सवाल जवाब करने पर, अलगू ने फैसला सुनाया की “खाला को खर्च देने लायक लाभ तो जायदाद से ही हो जाता है। अगर जुम्मन खाला को खर्च नहीं देंगे, तो रजिस्ट्री रद हो जायेगी।“ फैसला सुनकर जुम्मन नाराज होगया। जबकि, सब लोग अलगू की सच्चाई की तारीफ करने लगे। इस फैसले से दो दोस्त अब दुश्मन होगए। जुम्मन अब हर समय बदला लेने की सोचने लगा। अलगू के पास एक बैल था, जो उसने साहूकार को डेढ़ सौ रुपए में बेच दिया था। और एक महिने बाद दाम चुकाने की बात हुई। साहूकार बैल से दिन रात काम लेने लगा। न ठीक से चारा दिया न पानी, रोज़ कोड़े भी मरता था। एक दिन कोड़े की मार खाते हुए बैल गिरा और मर गया। अब अलगू एक महीने बाद दाम मांगने गए तो साहूकार ने कमज़ोर बैल कहके रुपए देने से मना करदिया तो अलगू ने पंचायत बुला ली। साहूकार ने जुम्मन और अलगू की दुश्मनी को देखते हुए जुम्मन को सरपंच बना दिया। पर सरपंच बनते ही जुम्मन को जिम्मेदारी का अहसास हुआ। वह न्याय एवम धर्म के आसन पर बैठे थे। वह समय निजी बदला लेने का नही था, सच का था। सवाल जवाब कि बाद जुम्मन ने फैसला सुनाया के कमज़ोर बैल साहूकार की लापरवाही से हुआ है। इसीलिए साहूकार को अलगू को बैल की पूरी कीमत देनी होगी। अलगू खुश होगया। जुम्मन अलगू के पास आकर गले लगकर बोला के “आज पता चला कि पंच को परमेश्वर क्यों कहते है।“ दोनो दोस्त रोने लगे और दिल का मैल धूल गया।

समीक्षा : इस कहानी में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है की पंच का आसान परमेश्वर का आसान होता है। इस पर बैठकर कोई धर्म विरुद्ध बात नही कर सकता। पंच के स्थान के प्रति इस कहानी में विश्वास रखा गया है। किसी का कितना भी निजी स्वार्थ क्यों न हों इस पद के आसान पर बैठकर वह आपने उस पद के दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाता है। इस कहानी का शीर्षक पंच परमेश्वर पूरी तरह से इस कहानी को साबित करता है। साथ ही ये कहानी हमे शिक्षा देती है, के मनुष्य अच्छा होता है पर विपरीत परिस्थितियों के कारण वे गलत प्रवृत्ति के फेर में आ जाता है। जैसे ही अनुकूल परिस्थितियां आती है वह अच्छा आचरण भी करता है।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts