गुलिवर्स ट्रैवल : बचपन की यादों का एक दौरा's image
Story7 min read

गुलिवर्स ट्रैवल : बचपन की यादों का एक दौरा

Kavishala ReviewsKavishala Reviews October 28, 2021
Share0 Bookmarks 246 Reads1 Likes


28 अगस्त 1726 में नॉवेल "गुलिवर्स ट्रैवल" प्रकाशित हुई थी। यह नाम पढ़ते ही हमारे स्मृति पट पे बचपन में पढ़ी, इसकी पुरी कहानी याद आ जाती है। 'बचपन' जो एक ऐसा दौर होता है जहां, आप परीलोक कथाएं, अपनी कल्पना, सपने, पढ़ी-सुनी कहानियों पर यकीन करते है। हर एक चीज आपको अपने सच होने का एहसास दिलाती है। सच मानो यह यकीन कहीं ना कहीं हमारे मन में किसी कोने में आज भी जिंदा है। भले ही हम कितने बड़े हो चुके हो, या फिर सच जानते हो कि यह सब नहीं होता है।

बचपन की हजारों कहानियों में से ही एक कहानी "गुलिवर्स ट्रेवल" की भी है कि - एक पानी के जहाज पर वह काम करता था। तूफान आने पर जहाज डूबने लगा तो, गुलिवर और उसके कुछ साथी छोटी सी नाव के सहारे बच गए। कुछ दिन ऐसे बीते, फिर एक और तूफान ने उनकी कश्ती को उल्टा दिया और वह सब पानी में गिर गए। फिर किसी को किसी का कुछ पता नहीं चला कि वह कहां है। ऐसे बहते-बहते गुलिवर एक टापू के किनारे पहुंच गया। वह वहां बेहोश था। जब धूप से उसकी आंख खुली, तो उसने उठने की कोशिश की। पर वह उठ नहीं पाया। उसे अपने आसपास हल्का सा शोर सुनाई तो दे रहा था, पर कोई उसे दिखाई नहीं दे रहा था। तभी उसे पैरो पर कुछ चलने का एहसास होता है। थोड़ी देर में वह देखता है कि, 6 इंच की आकृति वाले बौने लोग उसकी छाती पर चढ़े हुए थे। सभी के हाथों में भाले, तीर-कमान थे। जो उस पर निशाना साधे हुए थे। उस ने हिलने की कोशिश की तो वह भाले, तीर-कमान उस पर चलाने लगे, साथ ही साथ अपनी भाषा में उसे कुछ बोल रहे थे। जो कि गुलिवर को समझ नहीं आ रहा था। बौने को 'लिलिपुटियन ' कहते थे। वह जगह "लिलिपुट" थी। जहां वह पहुंचा, वहां हर चीज छोटी थी। 6 इंच के बौने थे। उनके खेत, पेड़-पौधे गुलिवर के लिए फूलों की कियारियो जैसी थी। कई हजारों लकड़ियों के टुकड़े जोड़कर एक गाड़ी बनाई और कई सारे पहिए लगाए। उस पर लेटा कर गुलिवर को राजा के पास ले जाया गया। उसके आकार को देखकर सभी लोग डरे हुए थे। उसके हिलने मात्र से ही उस पर तीर बरसाने लगे। पर राजा बहादुर था। वह किसी उसे मंच पर चढ़कर उससे कुछ बोलने लगा जो गुलिवर को समझ नहीं आया। पर गुलिवर ने इशारों में राजा को यह समझा दिया कि, वह भूखा प्यासा है। उसे कुछ खाने को दो। राजा दयालु भी था। उसके खाने के लिए 100 से ज्यादा गाड़ियां खाने से भरकर आई, बड़े-बड़े बैरल शराब के आए। परंतु, गुलिवर के लिए वह कुछ कौर - कुछ घूंट के बराबर ही थे। खाने-पीने के बाद, राजा ने उसकी तलाशी का आदेश दिया। कुछ बौने उसकी जेब में घुसे और तलाशी लेने लगे। अगर बाहर की दुनिया गुलिवर के लिए बहुत छोटी लग रही थी, तो वहीं पर उन दोनों के लिए गुलिवर की जेब गुफा लग रही थी। जेबों में रखा सामान विशाल लग रहा था। जैसे कि - गुलिवर का रुमाल बहुत बड़े कपड़े का टुकड़ा लग रहा था। एक मशीन नुमा कोई चीज निकली जिसमें 20 खंबे लगे थे। वह गुलिवर की कंघी थी। दो लकड़ी के खंभे मिले, जिस पर बड़ी मुश्किल से वो लोग चढ़ सके। ऊपर चढ़कर देखा तो, उसमें लोहे की बड़ी चादरे लगी हुई थी। पूछने पर पता चला कि, एक उस्तरा था दूसरा चाकू था। एक लंबी सी चांदी की जंजीर लटकी रही थी, इस जंजीर में एक इंजन बड़ा बंधा हुआ था। जो कि, एक बड़ा भारी गोला था। जो आधा चांदी का और आधा अन्य धातु का बना था। वह पारदर्शी था जिसके अंदर गोलाई में कुछ अजीब से निशान बने हुए थे। उस इंजन पर कान लगाने पर शोर हो रहा था। जैसे कोई कारखाना चल रहा हो। वह चीज गुलिवर की घड़ी थी। मजेदार बात तो यह है कि, बौने सोच रहे थे कि यह इसका देवता हो सकता है। जिसे यह हर घड़ी थोड़ी थोड़ी देर में देख रहा है। उसे देखे बिना कोई काम नहीं करता है। राजा और वहा के सभी लोग हैरान-परेशान थे। उसे 'पहाड़नुमा आदमी' कहकर बुलाया जा रहा था। धीरे-धीरे गुलिवर की अच्छाई उनको दिखाई देने लगी। कुछ समय बाद कुछ शर्तों पर उसे आजाद घूमने दिया। गुलिवर ने राजा से जाने की इजाजत मांगी तो, राजा ने दुश्मन देश के जहाजों को खत्म करने के लिए उसे कहा। तो गुलिवर ने खड़े होकर जायजा लिया कि जो, पानी है उसकी गहराई उन बौनो के लिए बहुत ज्यादा थी। पर गुलिवर के लिए 5 फीट थी। उसने कई सारी रस्सियों की मांग की तो, जो सबसे मोटी रस्सी थी वह गुलिवर के लिए मोटे धागे के समान थी। जब वो पानी में पैदल चल कर दूसरे देश के बंदरगाह पर पहुंचा तो, विशालकाय आदमी को देखकर वहां भगदड़ मच गई। कई सिपाही, लोग गिरे, घायल हो गए, सब उससे दूर भाग रहे थे। बड़े-बड़े पानी के जहाजों पर जो लोग काम कर रहे थे, वह जहाजों के हिलने डुलने से डर गए। उन्होंने देखा कि, गुलिवर के आगे चलने पर पानी में बड़ी-बड़ी लहर बन रही है। जिस से जहाज हिल रहे थे। वह सब डर के मारे पानी में कूद गए। तभी गुलीवर ने मोटे रस्सों से, सारे जहाजों को बांधा और खींच कर वापस लिलिपुट ले जाने लगा। जब तक दूसरे देश के लोग समझ पाते, तब तक वह काफी आगे निकल चुका था और वह बाद में भाले, तीर चला रहे थे। जहाजों को उसने लिलिपुट के राजा को दिया और अपना किया वादा पूरा किया। फिर, उसने अपने लिए छोटी नाव बनाई और वहां से रवाना हो गया। 

लेकिन जो यात्राएं मैं कर चुका हूं,

उनकी याद मुझे कभी नहीं भूलेगी।

इन यात्राओं में मुझे काफी तकलीफ़ हुई,

लेकिन मेरा अनुभव भी खूब बढ़ा।

मुझे अच्छे लोग भी मिले और बुरे लोग भी।

अजीब-अजीब देश और अजीब-अजीब लोग मैंने देखे,

जिन्हें मैं घर बैठे कभी नहीं देख सकता था

और न उनके बारे में कभी यह कहानी लिख सकता था

— गुलिवर

कहानी तो अभी भी कुछ रहती है। इसी कहानी के और भी कई भाग भी प्रकाशित हुए हैं। पर यह कहानी जिस तरह से लिखी गई है वह रोमांचकारी है। गुलिवर की नजर से बौने लोगो की दुनिया कैसी लगती है और बौने लोगो की नजर से गुलिवर और उसका सामान कैसा दिखाई देता है। हमारे लेख में यही दर्शाने की कोशिश की गई है और आप जब पढ़ते हैं तो ऐसा आपको भी लगेगा कि सचमुच यह सब हुआ होगा। यह चीजें ऐसी ही दिखाई दी होंगी। 

आशा करते है आपको यह पढ़कर बचपन की यादों का दौरा आपको पसंद आया होगा।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts