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विज्ञापन में एक कवि - अतुल कनक

Kavishala ReviewsKavishala Reviews November 21, 2021
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यह 1980 के दशक की बात है। हिन्दी की प्रख्यात कवियत्री महादेवी वर्मा को प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा हुई थी। एक पत्रकार इस घोषणा के बाद जब महादेवी का साक्षात्कार लेने गया तो महादेवी ने अपने बीते हुए दिनों को याद करते हुए केवल इतना कहा था -‘‘यदि यह पुरस्कार मुझे कुछ समय पहले मिल जाता तो मैं महाप्राण निराला को आर्थिक अभावों में दम नहीं तोड़ने देती।’’ निराला ही क्यों, मुक्तिबोध औरप्रेमचंद जैसे मूर्धन्य रचनाकारों को भी अर्थाभावों में जीवनयापन करना पड़ा। दो दशक पहले तक भी हिन्दी भाषा में रचनाकर्म को उन वृत्तियों में नहीं गिना जाता था, जिनमें रत रहते हुए व्यक्ति अपने परिवार को सहज जीवनयापन के लिये वांछित आवश्यक सुविधाऐं भी दे सकता था। कई चुटकुले उस दौर में प्रचलित हुए जिनमें हिन्दी के कवि की विपन्नता रेखांकित की गई। मसलन, एक कवि अपनी कब्जी की शिकायत को लेकर डॉक्टर के पास जाता है तो डॉक्टर उसे बीस रूपये देकर कहता है कि पहले कुछ खाओगे तब ही कब्जी की शिकायत दूर होगी।’’ या फिर यह कि एक तीन बच्चों का पिता अपने पुराने दोस्त से मिलता है तो बताता है कि उसके दो बच्चों का कैरियर तो बहुत अच्छा है लेकिन तीसरे बच्चे की चिंता है -क्योंकि वो हिन्दी का कवि हो गया है।

भले ही इस तरह के चुटकुलों में हिन्दी के रचनाकार की आर्थिक स्थिति का उपहास किया गया हो, लेकिन यह उपहास समाज के यथार्थ को भी रेखांकित करता है। एक तो अभिजात्य कहे जाने वाले वर्ग में अंग्रेजी का वर्चस्व इतना गहरा पैठा हुआ था कि लोग सही हिन्दी में कही गई बात की अपेक्षा गलत अंग्रेजी में कही गई बात को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। हिन्दी के रचनाकार के पास अपने को अभिव्यक्त करने के लिए जितने मंच थे, उनमें प्रस्तुति के लिये या तो पारिश्रमिक था ही नहीं; और पारिश्रमिक था भी तो इतना कि वो जीवन रूपी ऊँट के मुँह में जीरा प्रतीत होता था। हिन्दी की पत्र- पत्रिकाओं में मिलने वाला पारिश्रमिक तो आज भी अपवाद स्वरूप ही रचनाकार को कुछ ‘कमाने’ का संतोष दे पाता है। छोड़िये पुरानी बातों को, आज भी हिन्दी के अखबारों में अंग्रेजी के जाने माने रचनाकारों के लेखों को अनुवाद द्वारा छापा जाना सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

हाँ, कविसम्मेलनों में एक रात के पारिश्रमिक के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक अपेक्षाकृत अब आकर्षक हो गया है। लेकिन इस पारिश्रमिक की राशि को आकर्षक बनाए जाने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। गोपाल सिंह नेपाली, काका हाथरसी और डॉ. हरिवंशराय बच्चन को हिन्दी कविता की वाचिक परंपरा के आधुनिक दौर की नंीव रखने का श्रेय दिया जाता है। कुछ समय बाद गोपालदास नीरज, गोपाल प्रसाद व्यास और बालकवि बैरागी का नाम भी इस श्रृंखला में जुड़ गया। बच्चन जी की मधुशाला ने लोकप्रियता के नये आयाम स्थापित किये। देश भर में उन्हें सुनने की होड़ लग गई। एक यात्रा के बाद दूसरी यात्रा और दोनों यात्राओं के बीच रात में मंच पर प्रस्तुति देने का क्रम बहुत थका देने वाला होता है। यह थकान जब परेशान करने लगी तो बच्चन जी ने तय किया कि वो अपनी प्रस्तुतियों के लिये केवल मानदेय नहीं लेंगे बल्कि अपनी सुविधा के अनुरूप पारिश्रमिक लेंगे। आमतौर पर होता यह था कि रचनाकारों को मार्गव्यय के साथ कुछ अल्पराशि पत्रं-पुष्पं के तौर पर दे दी जाती थी। रात भर सामने जमे हुए श्रोता, उनकी वाह-वाह का तुमुलनाद और तालियाँ और सृजन के संसार को कुछ दे पाने का आत्मसंतोष रचनाकारों को सतत सक्रिय रखता था। लेकिन बच्चन जी ने इस आत्मसंतोष को आय की संभावनाओं से भी जोड़ने की पहल की। आज भी अधिकांश अकादमियों और सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में रचनाकारों को मार्गव्यय के अतिरिक्त एक निश्चित राशि पारिश्रमिक के तौर पर उसी तरह दी जाती है जिस तरह से किसी सरकारी कर्मचारी को अपने कर्तव्य निष्पादन के लिये संपन्न की गई यात्रा के विरूद्ध यात्राभत्ता दिया जाता है। कविसम्मेलनों का मानदेय पारिश्रमिक में बदला तो शुरू में कुछ लोगों ने नाक- भौं सिंकोड़ी लेकिन लोेकप्रियता के सम्मुख या यों कहें कि आयोजन का आकर्षण बनाए रखने के आकर्षण के सम्मुख यह पारिश्रमिक का अतिरिक्त कहा जाने वाला भार भी आयोजकों को मंजूर हुआ और धीरे धीरे हिन्दी कविसम्मेलन प्रभावशाली प्रस्तुति देने वाले कवियों के लिए आय का एक अच्छा साधन बन गये।

हालांकि इसके कतिपय नुकसान भी कालांतर में हिन्दी कविता की वाचिक परंपरा के इस समद्ध और सामर्थ्यवान प्रारूप को हुए। चूँकि आयोजकों को जमने वाले याने देर तक श्रोताओं को अपनी प्रस्तुति से बाँधे रखने वाले कवियों की आवश्यकता थी, इसलिये कविता के नाम पर चुहल को बढ़ावा मिला। पहले यह होने लगा कि चुटकुलों को तुकबंदी की शक्ल में पेश किया जाने लगा। बाद में तुकबंदी की जरूरत को भी दरकिनार कर दिया गया। कई कवि तो केवल चुटकुलों के दम पर कविसम्मेलनों का लोकप्रिय नाम हो गये। कुछ कवियों ने वीर रस की कविता के नाम पर शिष्ट अभिव्यक्ति की मर्यादाओं तक को अनदेखा किया। कविसम्मेलनों के आयोजन के लिये दलाल और ठेकेदार खड़े हो गये।लोकप्रियता बढ़ने लगी तो कुछ कवियों ने सुराखोरी को अपनी शर्त बना लिया। फिर यह भी हुआ कि कुछ कवि आयोजकों पर दबाव डालने लगे कि यदि उन्हें बुलाना है तो इस या उस कवियत्री को भी बुलाना होगा। जो कविसम्मेलन सरस्वती के प्रांगण में सृजन के संस्कार जगाने का माध्यम समझे जाते थे, वो धीरे धीरे ऐसी आदतों का शिकार हो गये जो आदतें पंचसितारा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये नैतिकता की सीमाऐं लांघकर भी दुनिया के कई देशों में पोषितऔर प्रोत्साहित की जाती हैं। अलग अलग लोगों ने अपने अपने गुट बना लिये। बहुत सी अपकारी प्रवृत्तियाँ कविसम्मेलनों की दुनिया में सक्रिय हुईं। लेकिन इन प्रवृत्तियों पर विस्तार से चर्चा करना फिलहाल यहाँ उचित नहीं। उनके बारे में फिर कभी बात करेंगे। फिलहाल सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि किसी भी क्षैत्र से नाम और धन की आमद जुड़ने पर जो जो अपकारी प्रवृत्तियाँ उससे जुड़ने को व्यग्र हो जाती हैं, वो प्रवृत्तियाँ कविसम्मेलन की परंपरा से भी आ जुड़ीं। 

इससे हिन्दी कविता का भला कम हुआ लेकिन हिन्दी की कविसम्मेलन परंपरा से जुड़े कई लोगों का भला हुआ। मैंने सभी लोगों का भला हुआ इसलिये नहीं कहा क्योंकि इस दौर में यह प्रवृत्ति भी देखी गई कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने इस या उस प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं पाए जाने पर कई प्रतिभाओं को या तो लामबद्ध होकर हाशिये में धकेला या सतत साज़िशों से संघर्ष के कारण कुछ प्रतिभाऐं स्वयं ही इन मंचों से पलायन कर गईं। लेकिन ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि इस दौर में लोकप्रिय हुई सभी प्रतिभाऐं समझौतों या साजिशों के कारण बड़ा नाम हुईं। कई लोग प्रतिभा का ऐसा विस्फोट थे कि उनकी आवाज़ को लाख कोशिशों के बावजूद नहीं दबाया जा सका। कुछ लोकप्रिय नामों को राजनीति ने अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। प्रभावशाली अभिव्यक्ति लोकतंत्र में हर समूह की आवश्यकता होती हैै।कवि के पास प्रभावशाली अभिव्यक्ति का दैवदत्त वरदान होता है। आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक मैथलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर जैसे नामों को राज्यसभा के लिये नामित किया जाता रहा ताकि सदन में सत्य की रक्षा की चेतना को मुखर रखा जा सके। बाद के वर्षों में तो कई मुखर रचनाकार चुनाव लड़े। कई जीते। बालकवि बैरागी जैसा लोकप्रिय कवि मध्यप्रदेश में विधानसभा का चुनाव जीतकर राज्यसरकार में मंत्री बना। अस्तु।

1980 के दौर में ही युवा रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी नई चेतना के साथ हिन्दी कविसम्मेलनों के मंच पर उदित हुई।इस पीढ़ी के आठ-दस रचनाकार तो अपने अपने रसों में जैसे तमाम झंझावातों को चुनौती देने की आग को अंतस में पाले हुए थे। यह वह दौर था जब कुछ लोग यह कहने लगे थे कि हिन्दी कविसम्मेलनों की पुरूष प्रस्तुतियों से गीत-तत्व गायब होने लगा है। हालांकि सोमठाकुर, नीरज, कुँअर बेचैन जैसे कई नाम अभी भी सक्रिय थे। उसी दौर में एक नाम धीरे धीरे उभरा और देखते ही देखते लोकप्रियता का प्रतिमान बन गया। जी हाँ, डॉ. कुमार विश्वास। हालांकि अपनी इस यश यात्रा में कुमार विश्वास को भी कुछ क्षत्रपों की सुनियोजित साज़िशों का शिकार होना पड़ा। लेकिन कुमार ने अपने अध्ययन, चिंतन और सृजन को हर युद्ध में अपना हथियार बनाया। ध्वंस और विद्वेष सृजन की चेतना को चुनौती तो दे सकते हैं लेकिन उसे नेस्तनाबूद नहीं कर सकते। कुमार के व्यक्तित्व की जो बात उनके प्रशंसकों को हमेशा प्रभावित करती है, वह है अभिव्यक्ति की ईमानदारी। मैं कई बार कहता हूँ कि शब्द ब्रह्म है। उसके साथ खिलवाड़ करने वाला ब्रह्म के श्राप को प्राप्त होता है और यह श्राप अंततः अंतहीन पीड़ाओं को जन्म देते हैं। हिन्दी कविसम्मेलन की वर्तमान परंपरा ने ही ऐसे उदाहरणों को देखा भी है। 

डॉ. कुमार विश्वास का यह लक्ष्य प्रारंभ से ही मुखर रहा कि उन्हें हिन्दी के रचनाकार को उसकी ‘बेचारा’ वाली छवि से बाहर लाना है। इसीलिये अपने खिलाफ मुखर रहे लोगों की मदद की ज़रूरत हुई तो भी वो मदद का हाथ बढ़ाने में हिचकिचाए नहीं। राजनीति ने भी उनके संकल्पों की मनुहार की। ‘सच को सच कहने की ज़िद’ कई बार आप को आपका श्रेय नहीं लेने देती। गुरू बृहस्पति के खिलाफ साज़िश रचने के लिये देवराज इंद्र और चंद्रमा एकजुट हो सकते हैं तो फिर आदमी की क्या बिसात? कुमार की सृजन चेतना का एक प्रभावशाली पक्ष यह भी है कि अपने प्रवाह का मार्ग अवरूद्ध करने की कोशिशों से वह कुंठित नहीं होते। एक नई धारा का और विकास कर लेते हैं। 

फिलहाल कुमार विश्वास की बात करने का मंतव्य भी स्पष्ट कर दूँ। पिछले दिनों एक प्रसिद्ध भारतीय कंपनी ने कुमार से अपने च्यवनप्राश का विज्ञापन करवाया है। हिन्दी कविता संसार के लिये यह क्षण एक अद्भुत अनुभूति का कहा जा सकता है क्योंकि बेचारा माने जाने वाला हिन्दी कवि कभी इस लायक समझा ही नहीं गया कि उसकी कही गई बात समाज के एक बड़े तबके को विज्ञापन में उसकी उपस्थिति से लुभा सकती है। इसके पहले हमारे दौर के दो हास्य कवि प्रिंट मीडिया के विज्ञापन में दिखे हैं, सुरेन्द्र शर्मा और शैलेष लोढ़ा। इसके अलावा यदि किसी अन्य कवि का विज्ञापन की दुनिया में उपयोग हुआ हो तो मेरी स्मृति में नहीं। सुरेन्द्र शर्मा ने निश्चित रूप से हिन्दी की हास्यकविता को अपने ‘चार लाइणाँ’ के माध्यम से लोकप्रियता के नये आयाम दिये हैं लेकिन उनके चेहरे वाला विज्ञापन कुछ समय तक ही कुछ पत्रिकाओं में दिखा। शैलेष लोढ़ा ने अपने सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ हास्य-व्यंग्य कवि के तौर पर राजस्थान के जोधपुर शहर से किया और फिर एक धारावाहिक में अभिनय करने के लिये वो मुंबईवासी हो गये। उनके कवि की तुलना में उनकी पहचान एक अभिनेता के रूप में ज्यादा है। फिर भी शैलेष लोढ़ा इस बात को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये कि अभिनेता के रूप में प्रसिद्धि हासिल करके भी उन्होंने कविमंचों से अपने रिश्ते को कायम रखा है और जहाँ कहीं वो हास्य कविता पढ़ते हैं, सकारात्मक संदेश के साथ अपने काव्यपाठ का समापन करते हैं। बॉलीवुड क्रे प्रसिद्ध हस्ताक्षर जावेद अख्तर एक दवा के विज्ञापन में वर्षों से दिख रहे हैं लेकिन बॉलीवुड तो हमेशा से ही बाजार का प्रिय रहा है। यही बात प्रसून जोशी के संदर्भ में भी कही जा सकती है।

लेकिन कुमार विश्वास बॉलीवुड के सहारे बड़ा नाम नहीं हुए। बेशक कुछ फिल्मों में उनके गीतों का इस्तेमाल हुआ है लेकिन आज भी कुमार के नाम के साथ फिल्मी गीतकार नहीं लिखा जाता बल्कि कवि- गीतकार लिखा जाता है। हिन्दी कविसम्मेलनों की दुनिया में तो यह माना जाता है कि कुमार की उपस्थिति ही कार्यक्रम की सफलता की गारंटी है लेकिन एक वर्षों पुरानी भारतीय कंपनी अपने एक अत्यंत लोकप्रिय उत्पाद के लिये कुमार की छवि को व्यावसायिक सफलता की गारंटी मानती है तो यह उन चुटकुलों को मुँहतोड़ जवाब देता है जो हिन्दी कवि को बेचारा बनाकर प्रस्तुत करते हैं क्योंकि कुमार विश्वास ने जो कुछ अर्जित किया है वेा अपनी चेतना और हिन्दी कविता के दम पर ही अर्जित किया है। शायद इसीलिये तो कुमार हिन्दी को ‘माँ हिन्दी’ कहते हैं और कविताकर्म को माँ का प्रसाद।

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