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वीभत्स रस : घृणा की अभिव्यक्ति के भाव को व्यक्त करने वाला रस

Kavishala LabsKavishala Labs November 1, 2021
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वीभत्स रस की परिभाषा — किसी वस्तु अथवा जीव को देखकर जहां घृणा का भाव उत्पन्न हो वहां वीभत्स रस होता है। वीभत्स घृणा के भाव को प्रकट करने वाला रस है।

यह भाव आलंबन , उद्दीपन तथा संचारी भाव के सहयोग से आस्वाद का रूप धारण कर लेती है, तब यह वीभत्स रस में परिणत होती है। इस रस को लेकर आचार्यों में भी मतभेद है , कुछ आचार्य इस रस को मानसिक मानते हैं तो कुछ इसे तामसिक बताते हैं। अर्थात एक पक्ष व्यक्ति से व्यक्ति , तथा सामाजिक बुराई को घृणा के अंतर्गत रखते हैं , तो दूसरा मांस और रक्तपात आदि को इसकी श्रेणी में रखते हैं।

निम्न लिखित कुछ कविताएं वीभत्स रस के उदाहरण है :-

(i) "जलियाँवाला बाग में बसंत"

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, 

काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। 

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से, 

वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे। 

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है, 

हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है। 

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना, 

यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना। 

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना, 

दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना। 

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें, 

भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें। 

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले, 

तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले। 

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना, 

स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना। 

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर, 

कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर। 

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं, 

अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं। 

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना, 

कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना। 

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर, 

शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर। 

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना, 

यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

— सुभद्राकुमारी चौहान

व्याख्या : यहां जलियांवाला बाग की घटना का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यहां कोयल नहीं, बल्कि कौवे शोर मचा रहे हैं। जो काले-काले कीड़ों भंवरों की तरह दिख रहे हैं। हाय! यह प्यारा सा बाग जो पौधों, अधखीली कलियों, फूलों से सजा होता था। आज यह बाग खून से सना हुआ है। अरे बादलों, यहां धीरे से आना। यहां शोक का स्थान है। यहां शोर मत मचाना। यहां दुख की आहे हैं, हवा से कहो अपने संग आहो को मत उड़ा ले जाना। यहां पर कितनी मांओं के कोमल बालक गोली खा कर मर गए हैं। परिवार के परिवार उजड़ गए हैं। लाशों के ढेर लगे हैं। कुआं लाखों लाशों से भर गया है। चील-कौवे आकाश में घूम रहे हैं। कितने बूढ़े-जवान सब मर गए हैं। यहां शोक का स्थान है। अरे, ओ ऋतुराज! यहां शोर मत मचाना, धीरे से आना।

(ii) "सिर पर बैठो काग, आँखि दोउ खात निकारत"

सिर पर बैठो काग, आँखि दोउ खात निकारत

खींचत जी भहिं स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत

गिद्ध जाँघ कह खोदि-खोदि के मांस उचारत

स्वान आँगुरिन काटि-काटि के खान बिचारत

बहु चील्ह नोंचि ले जात तुच, मोद मठ्यो सबको हियो

जनु ब्रह्म भोज जिजमान कोउ, आज भिखारिन कहुँ दियो

व्याख्या : इस पंक्ति में मृत जीव का वर्णन है , जिसके सिर पर कौवा बैठे हैं जो आंख निकाल कर खा रहे हैं। चारों ओर से सियार घेर कर उस लाश को नोच रहे हैं और आनंद की अनुभूति कर रहे हैं।

गिद्ध उस मृत के मासों को नोच रहा है तथा कुत्ते उसे काट काट कर खा रहे हैं। चील तथा अन्य जीव भी इस मृत जीव का आनंद लेकर भक्षण कर रहे हैं।यह दृश्य बेहद ही विचलित करने वाला है। इस दृश्य को देखकर मन में घृणा का भाव उत्पन्न होता है।

(iii) "निकल गली से तब हत्यारा"

निकल गली से तब हत्यारा

आया उसने नाम पुकारा

हाथों तौल कर चाकू मारा

छूटा लोहू का फव्वारा

कहा नहीं था उसने आख़िर हत्या होगी।।

— भवानी प्रसाद मिश्र

व्याख्या : प्रस्तुत पंक्ति भवानी प्रसाद मिश्र की रामदास कविता से है। इस पंक्ति में बताया गया है किस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति को समाज के दूषित लोगों ने घोषणा कर दी चौराहे पर पूरे समाज के सामने हत्या कर दी। वह निःसहाय सड़क पर तड़पता रह गया किंतु कोई भी उसकी सहायता को आगे नहीं आया। समाज तरह – तरह की बातें करने लगे कोई उसकी सहायता को आगे ना आया। वह हत्यारे भीड़ को खेलते हुए वहां से निकल गए।

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