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शांत रस : मन की संतुष्टि की अभिव्यक्ति के भाव को व्यक्त करने वाला रस

Kavishala LabsKavishala Labs October 21, 2021
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शांत रस की परिभाषा — ज्ञान की प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने के पश्चात जब मनुष्य को न सुख-दुःख और न किसी से द्वेष-राग होता है, तो ऐसी मनोस्थिति में मन में उठा विभाव शांत रस कहलाता है।

निम्न लिखित कुछ कविताएं वीर रस के उधारण है :-

(i) "दुपहरिया"

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों-

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को 'चुर-मुर' ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में-

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की।   

— केदारनाथ सिंह

व्याख्या : मौसम बदल रहा है।सुबह में ठंड की बस खुनक भर बची है। दिन में गर्मी बढ़ने लगी है।नीम के पत्ते झर रहे हैं।यह मौसम उदास करता है। लेकिन उम्मीद के नए पत्ते भी निकल रहे हैं।आम की नई चिकनी कोंपलें गहरे कत्थई रंग में फूल सी दिखती हैं। उदास मौसम में उम्मीद की कोंपलें नए रंग भर रही हैं।

(ii) "धर्म"

तेज़ी से एक दर्द

मन में जागा

मैंने पी लिया,

छोटी सी एक ख़ुशी

अधरों में आई

मैंने उसको फैला दिया,

मुझको सन्तोष हुआ

और लगा –

हर छोटे को

बड़ा करना धर्म है ।

— दुष्यंत कुमार

व्याख्या : कवि कहता है कि, मेरे मन में एक दर्द उठ रहा है। फिर भी मैं वह दर्द सहन कर रहा हूं। एक छोटी सी खुशी आई, मेरे मन के अंधेरे को चीरती हुई और उस किरण ने अपना प्रकाश मेरे मन के हर कोने में फैला दिया। इससे मुझ को संतुष्टि हुई और लगा कि हर छोटी चीज का बड़ा काम करना धर्म हैं।

(iii) "जब मै था तब हरि नाहिं अब हरि है मै नाहिं

सब अँधियारा मिट गया जब दीपक देख्या माहिं"

देखी मैंने आज जरा

हो जावेगी क्या ऐसी मेरी ही यशोधरा

हाय! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण सुवर्ण खरा

सुख जावेगा मेरा उपवन जो है आज हरा

लम्बा मारग दूरि घर विकट पंथ बहुमार

कहौ संतो क्युँ पाइए दुर्लभ हरि दीदार।।          

व्याख्या : यहां मैं को अहम् (अहंकार), हरि को परमेश्वर और अँधियारा को अंधकार से संबोधित किया गया है। कवि कहा चाहते है के जब अहंकार और अहम् (स्वंय के होने का बोध) होते हैं तब तक ईश्वर की पहचान नहीं होती है। अहम् के समाप्त होने पर हरी (ईश्वर का वास होता है ) का भान होता है। अंधियारे होता है अहम्, माया, नश्वर जगत के होने का। अहम् के समाप्त होने के उपरांत अंदर का विराट उजाला दिखाई देता है। जब तक स्वंय के शाश्वत होने का भाव रहता है, अहम् (मैं) रहता है, इस संसार को वास्तविक समझने का भान रहता है, तब तक हरी (ईश्वर ) का आभास तक नहीं हो पाता है। अहम् को समाप्त करने के उपरान्त ही ईश्वर रूपी दीपक के उजाले का ज्ञान होता है जिससे सारा अन्धकार मिट जाता है।

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